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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 2 • श्लोक 4
यं कंचित्पुरुषवरं स्वभर्तुरतिसुन्दरं दृष्ट्वा । मृगयति किं न मृगाक्षी मनसेव परस्त्रियं पुरुषः ॥
जिस प्रकार पुरुष रूपवती स्त्री की ताक में रहता है उसी प्रकार क्या मृगलोचना स्त्री अपने पति से अधिक रूपवान्‌ पुरुष को देखकर उसे मन-ही-मन नहीं ढूंढा करती?
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