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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 2 • श्लोक 17
अश्नन्ति चेदनुदिनं वन्दिन इव वर्णयन्ति संतृप्ताः । तच्चेद्द्वित्रदिनान्तरमभिनिन्दन्तः प्रकुप्यन्ति ॥
यदि वे नित्यप्रति नाना प्रकार के पदार्थ खाते रहते हैं, तो खूब तृप्त होकर बन्दीजन की भाँति बड़ाई करते हैं, उनमें यदि दो-तीन दिन का भी अन्तर पड़ जाय तो वे (प्रशंसा करने वाले) ही कुवाक्य कहते हुए कोप करने लगते हैं।
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