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अध्याय 1 — लघुस्तवः

पञ्चस्तवी
21 श्लोक • केवल अनुवाद
इन्द्र-धनुष की भांति (अनेकानेक) कांति को जिसने ललाट (मस्तक) के बीच में धारण किया है, शीतल किरणों वाले चन्द्रमा की श्वेत-ज्योति को (जिसने) शिर अर्थात् ब्रह्माण्ड में संपूर्ण रूप से फैलाया है अर्थात् प्रकाशित किया है और (जिसने) उष्ण-किरणों वाले सूर्य के प्रकाश को सदा हृदय में स्थान दिया है वही इन तीन स्वरूपों को पूर्ण करने वाली त्रिपुरादेवी प्रकाशविमर्शमयी अपने (ऐंद्रस्य - इसमें 'ऐं' पद-से, शौक्लीं - इसमें 'क्लीं' पद से, एषासौ इसमें 'सौः' पद से) इन तीन पदों से हमारे पापों को क्षण-मात्र में नष्ट करे।
आपके प्रथम-बीजाक्षर (एँ) में जो आपको उत्कृष्ट कला, त्रपुसी नामक लता-विशेष के अत्ति सूक्ष्म तन्तुओं के समान विकास को प्राप्त हुई तथा उस के साथ होड़ अर्थात् बराबरी करने पर तुली हुई है, उसे हम जगत् को उत्पन्न करने के कार्य में कटिबद्ध बनी हुई आपकी ही कुण्डलिनी शक्ति मानते हैं। इस प्रकार (आपकी कुण्डलिनी-शक्ति के) स्वरूप को जानकर अर्थात् अनुभव करके मनुष्य मां के गर्भ में बालक-भाव को कदापि स्पर्श नहीं करते हैं, अर्थात् वे सदा के लिये जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होते हैं।
हे अभीष्ट वर को देने वाली देवी। जिस व्यक्ति ने कोई भयप्रद वस्तु शेर सांप आदि देख कर बिना किसी अभिप्राय से भय-यशात् ही ऐ ऐ अक्षर का बिन्दु के बिना ही उच्चारण किया हो ऐसे व्यक्ति पर भी यदि आप अनुग्रह करें तो निःसन्देह उस व्यक्ति के मुख-कमल से उसी क्षण ऐसी कविता प्रकट होती है जो कि अमृत-रस-धाराओं की परिचायक होती हैं। अभिप्राय यह है कि भगवती के प्रथम बीजाक्षर 'ऐं' की इतनी महिमा है कि यदि कोई व्यक्ति भूल से भी 'ऐ ऐ' - का ही उच्चारण करे तो उसे भगवती अपूर्व कवित्व-शक्ति प्रदान करती हैं।
हे सदा एकवत् रहने वाली देवी! आपका जो दूसरा कामराज-नामक निष्कल अर्थात् कलना-रहित अथवा 'क-ल' -रहित क्लीं बीजाक्षर है, इस मन्त्र का जप, यदि कोई विरला बुद्धिमान् व्यक्ति इस संसार में करे तो वह सारस्वत क्लीं बीजाक्षर का साक्षात्कार करके सरस्वती देवी के अनुग्रह का पात्र बनता है। इस बीजाक्षर के जप के संबन्ध में यह कहना अप्रासंगिक न होगा कि सत्यवादी श्री हरिश्चन्द्र ने इस मन्त्र को सिद्ध किया था, जिसके फलस्वरूप सभी ब्राह्मण प्रत्येक उत्सव के प्रारम्भ में उसकी कथा उसी आदर से वर्णन करते हैं, जिस आदर से ओं का उच्चारण प्रत्येक यज्ञ के आद्य में किया जाता है।
मैं चन्द्र-तुल्य-दीप्ति से युक्त आपके उस तीसरे बीजाक्षर (सौः) को मन से नमस्कार करता हूँ, जिसका प्रभाव ज्ञानी-जनों ने क्षण-मात्र में देखा है जिस के फलस्वरूप उनकी वाणियों में निरर्गल कवित्व-शक्ति प्राप्त होती है। वह सरस्वती को सिद्ध कराने वाला (सौः) मन्त्र अज्ञानरूपी जल को भस्म करने में वाडवाग्नि के समान बन जाता है, तथा उस सारस्वत (सौः) की छाया का अनुकरण करने वाला (गौ) शब्द, जो वाणी के अर्थ में प्रयुक्त होता है ग के बिना औ के रूप से ही सिद्धि-प्रद बन जाता है। अथवा इसका दूसरा अर्थ यह भी हो सकता है कि यह सरस्वती का बीजाक्षर योग क्रिया करने के बिना ही अभीष्ट-सिद्धि प्रदान करता है।
हे देवि ! 'ऐं' क्लीं' 'सौः' इनमें से आपका प्रत्येक निष्पाप बीजाक्षर व्यञ्जन सहित (ऐं, क्लीं, सौः), व्यञ्जन रहित (ऐ, ई, औः) या कूटस्थ (एँ-क्लीं-सौः), अथवा भिन्न क्रम में ठहरा हुआ ऐं, अथवा क्लीं या केवल सौः, या उलटे क्रम से (सौः- क्लीं-ऐं) जिस किसी विधि से जो कोई व्यक्ति ध्यान करता है अथवा उसका जप करता है, उन मनुष्यों की सभी अभिलाषाओं को वह बीजाक्षर उसी क्षण सफल बना देता है।
हे माता ! (आपका स्वरूप चार भुजाओं से युक्त है) आप बायें हाथ में पुस्तक को धारण किये हुए हैं, दूसरे बायें हाथ में अभय-मुद्रा को दिखा रही हैं। ऊपर के दाहिने हाथ में अक्षमाला (जप-माला) को लिये हुई हैं तथा चौथा हाथ भक्तों को वर देने के कारण कोमल बना हुआ है। इसके अतिरिक्त आप काफूर तथा कुन्द-फूल की भांति उज्ज्वल तथा विकसित कमल-पत्र के समान सुन्दर नेत्रों से युक्त प्रेममयो अनुग्रह-दृष्टि रखती हैं। जो जन आपके ऊपर वर्णित स्वरूप का ध्यान मन से कदापि नहीं करते, भला उनको पाण्डित्य कैसे और क्यों प्राप्त हो सकता है।
हे सरस्वती देवी। आप सफेद पुण्डरीक कमल के समूह की भांति स्पष्ट (निर्मल) तथा सुन्दर दीप्ति से युक्त हैं। आप ऐसी प्रतीत होती हैं, मानो बहते हुए अमृत के द्वारा भक्तों को सिंचन करती हैं। ऐसे आपके स्वरूप का ध्यान जो भाग्यशाली व्यक्ति करते हैं, उनके मुख-कमल से गंगा नदी की गहन तथा (चंचल) प्रवहन-शील लहरों की भांति उछलती हुई, सुन्दर स्पष्ट अक्षरों तथा पदों से युक्त वाणी अर्थात् कविता अनथक रूप से प्रसरित होती है।
जो व्यक्ति एकाग्र मन से आपके अरुण-वर्ण तेज के द्वारा इस आकाश को सिन्दूर की धूलि के समूह से रंजित बनी हुई तथा इस पृथ्वी को पिघले हुए लाख के रस में सनी हुई जैसी देखते हैं अर्थात् आकाश और पृथ्वी में व्याप्त बने हुए आपके अरुण-वर्ण-स्वरूप का साक्षात्कार एक क्षण के लिये भी करते हैं, उनको संकल्प-विकल्प के कारण दुःखी बनी हुई (अपनी) इन्द्रियां उसी भांति वश हो जाती हैं, जिस भांति स्वभावतः चञ्चल और डरपोक हिरण के बच्चों की दृष्टि किसी शेर आदि को देखकर आप ही आप सहम जाती है।
जो व्यक्ति एकाग्र बने हुए हृदय में आपका स्वरूप चमकीले स्वर्ण-कुण्डलों से युक्त, बाजूबन्द को धारण किये हुए तथा सोने का गजरा बान्चे हुए स्वरूप से युक्त आपका ध्यान एक क्षण के लिये ही करते हैं, उनके घरों में मद-मस्त हाथी के चञ्चल कानों की भांति सदा चलायमान और इसीलिये अस्थिर बनी हुई भी लक्ष्मी (संपदा) बहुत समय के लिये विपुल-रूप से सदैव स्थिर रूपता से अपना स्थान बना लेती है। भाव यह है कि आप के भक्तों के घर से लक्ष्मी कभी भी जाने का नाम नहीं लेती है, अतः वे सदा समृद्धिशाली बने रहते हैं।
हे देवी ! आपकी जटाओं के समूह पर चन्द्रमा का (अर्घाकार) खण्ड ऐसा शोभित होता है मानो आप ने किनारी की बन्धी बान्ध रक्खी है। गले में आपने मरे हुए मनुष्यों के सिरों की माला धारण की है। आप बन्धूक नामक फूलों की तरह लाल वस्त्रों को धारण करती हैं और आप शिव रूपी शव का आसन बना कर उस पर बैठी हैं। आप चार भुजाओं वाली हैं। तीन नेत्रों वाली हैं। बड़े और उन्नत वक्षस्थल अर्थात् ज्ञान और क्रिया से युक्त आपका स्वरूप है तथा इन्हीं आपके ज्ञान-क्रिया रूपी स्तनों के मध्य में तीन गहरी भव-अभव और अतिभव रूपी कुण्डलाकार लकीरें सुशोभित हुई हैं - इस प्रकार आपके स्वरूप का साक्षात्कार करने के लिये भक्तजन आपका ध्यान वीरात्मक लास्यवृत्ति में सदा करते रहते हैं।
राजाओं के साधारण कुल में एक सामान्य राजसेवक के रूप में उत्पन्न होने पर भी जो 'वत्सराज' नामक सम्राट् सम्पूर्ण पृथ्वी पर चक्रवर्ति-पदवी को प्राप्त करके ऐश्वर्य से उन्नत मस्तक वाला बना और जिसके चरणों की वन्दना (नित-प्रति) विद्याधरों का समूह करने लगा। हे जगन्माता। (सच तो यह है कि) उस का सभी यह ऐश्वर्य आपके चरण कमलों में नत-मस्तक रहने से उत्पन्न आपके ही अनुग्रह का प्रत्यक्ष फल था।
हे चण्डिका भगवती ! जिन व्यक्तियों के हाथों ने आपके चरण-कमलों को पूजा करने के लिए बिल्वपत्रों को काटते हुए (उस बिल्व वृक्ष में स्थित) कांटों के तीखे अग्रभाग के चुभने से उत्पन्न दुःख का अनुभव न किया हो, वे जन भला (आगामी जन्म में) दण्ड, अंकुश, चक्र, धनुष, वज्र, लक्ष्मी तथा मछली की आकृतियों से अंकित कमल के समान हाथों से युक्त चक्रवर्ती सम्राट् किस भांति बन सकते हैं। कहने का भाव यह है कि जो भक्त, जगज्जननी की, पूजा के लिए अनेक कष्टों को सहन करता है उसी के हाथ दूसरे जन्म में दण्ड आदि चिन्हों से युक्त होते हैं, जिसके फलस्वरूप वह सम्राट् बनने की योग्यता रखता है। (शस्त्रों का कहना है कि जिस व्यक्ति के हाथों में - दण्ड, अंकुश, चक्र, धनुष, वज्र, लक्ष्मी तथा मत्स्य - इनमें से किसी एक का भी चिन्ह अंकित हुआ हो, वह निःसन्देह चक्रवर्ती राजा बन जाता है। स्मरण रहे कि ऐसा चक्रवर्ती सम्राट् जगन्माता की कृपा से ही होता है)
हे देवी ! हे त्रिपुरा भगवती ! (आप के भक्त-जन) ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र क्रम से दूध, घी, शहद तथा मदिरा से आप (विश्वोत्तीर्णा और विश्वमयी) देवी की पूजा करके आपको सन्तुष्ट करते हैं। उसके फलस्वरूप उन स्थिरबुद्धि वालों का मन जिस भी यथाभिलषित वस्तु की याचना आपके सम्मुख करता है वे अभीष्ट सिद्धियां उसे निर्विघ्न बनकर प्राप्त होती हैं।
हे देवी ! इस संसार में आप समस्त शब्द-भण्डार की जननी अर्थात् कारण हैं। आपको वाग्वादिनी अर्थात् सरस्वती कहते हैं। आपके स्वरूप से ही नारायण, इन्द्र आदि देवता भी प्रत्यक्ष रूप से प्रकट होते हैं। कल्प के अन्त में वे सभी ब्रह्मादि देवता-गण तथ्यतः आपके स्वरूप में लीन होते हैं अर्थात् अपनी स्थिति को खो बैठते हैं। वही आपका अचिन्त्य महिमा वाला स्वरूप परा शक्ति के नाम से कहा जाता है।
'ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र' - तीन देवताओं का वर्ग, 'ऋक, यजु, साम' - वेदत्रयी, अग्नि देवता की तीन शक्तियां - 'गार्हपत्य, आहवनीय, दक्षिणाग्नि', तीन स्वर - 'उदात्त, अनुदात्त, स्वरित', तीन लोक - 'भूः, भुवः, स्वः', गायत्री के तीन पद - 'भूः, भुवः, स्वः', ज्योतिष शास्त्र में वर्णित तीन पुष्कर - योग, तीन ब्रह्म - ओं, तत् सत्' और तीन वर्ण - 'अ, उ, म' - इसी भांति संसार में जो भी तीन-तीन रूप वाली वस्तु नियमित कही गई हैं, वह सभी 'त्रिपुरा' अर्थात् तीन स्वरूपों को पूर्ण करने वाली भगवती के नाम के ही अनुगामी अर्थात् परिचायक हैं।
राज-कुल में साक्षात् 'लक्ष्मी' की भांति, भयंकर युद्ध-भूमि में जय-प्रदा 'विजया' की भांति, दुःख-ग्रस्त संसार में कल्याणस्वरूप वाली 'क्षेमंकरी' की भांति, आम-मांस-भक्षक सिंह तथा हाथी और सांप आदि भयंकर प्राणियों से घिरे हुए कठिन दुर्गम जंगलों से युक्त पर्वतस्थानों में आपको रक्षा करने वाली 'भीलिनी' के समान, भूत, प्रेत, पिशाच और गीदड़ों के भय में 'महाभैरवी' के समान, सांसारिक मोह में 'त्रिपुरा' का स्वरूप बनी हुई और संकट रूपी विस्तृत जल से युक्त समुद्र में 'तारा' (नौका) के समान बनी हुई जो मनुष्य आपका स्मरण करते हैं, वे उपरोक्त सभी आपदाओं से छूट जाते हैं।
हे देवी ! आप माया रूप हैं, कुण्डलिनी के स्वरूप वाली हैं, मधुमती नामक योगसंबंधी भूमिका हैं, (इस मधुमती भूमिका में जाकर योगियों के सम्मुख अपनी करणेश्वरी-देवियां वर देने के लिये उपस्थित हो जाती हैं) आप काली भगवती हैं, आप निवृति, प्रतिष्ठा, विद्या, शान्ता तथा शान्तातीता नामक पांच कलाओं का स्वरूप बनी हुई हैं, नकार वर्ण से लेकर फकार तक मालिनी-रूप हैं। दस महाविद्यालयों में से आप मातंगी-विद्या-स्वरूप हैं। आप विजया, जया, भगवती, देवी, पार्वती तथा शम्भु-पत्नी हैं। आप शक्ति-स्वरूप हैं। शंकर भगवान् की प्रिया हैं। तीन नेत्रों वाली हैं। आप सरस्वती हैं। आप भैरव नाथ की शक्ति हैं। आप हींकार-रूपा हैं। तीन अवस्थाओं को पूर्ण करने वाली त्रिपुरा हैं। भोग तथा मोक्ष को देने वाली हैं। आप माता जगज्जननी हैं और भेदरूप माया का नाश करने वाली कुमारी हैं।
हे तीनों लोकों को पूर्ण करने वाली देवी! हे भैरव-पत्नि ! जो आपके अत्यन्त रहस्य बने हुए (बीजाक्षर) रूप में नाम हैं, वे आ, ई स्वरों रूपी पत्तों से युक्त हैं। दो, तीन वर्षों के क्रम से संयुक्त रूप वाले हैं। ककार से लेकर क्षकार अन्त वाले हैं। स्वरों से युक्त हैं अथवा स्वरों से युक्त क्षकार अन्त वाले हैं अर्थात् अक्षहीं नफहीं वाले हैं। उन आपके अति उत्कृष्ट बीस हजार नामों को हमारा प्रणाम हो।।
सरस्वती भगवती की यह तीन अवस्थाओं को पूर्ण करने वाली त्रिपुरा नाम वाली स्तुति, मन को एकाग्र बना कर तथा देवी की भक्ति में लीन होकर शिव-शक्तिपात से अनुगृहीत बने हुए विद्वानों को भली-भांति समझनी चाहिये। जहां इस स्तुति के प्रथम श्लोक में एक अर्थात् पहिले ऐं, दो अर्थात् दूसरे क्लीं, तीन अर्थात् तीसरे सौः- इन तीन पदों के क्रम से युक्त आपके चरणों के साथ संबन्ध रखने वाले बीजाक्षरों के द्वारा मन्त्रोद्धार की विधि विशेषपूर्वक वर्णन की गई है, वहां यह स्तुति गुरुजनों के सत्संप्रदाय से भी युक्त है अर्थात् गुरुजनों के द्वारा ही इस स्तुति का प्रादुर्भाव हुआ है।
मेरी यह स्तुति सदोष है या निर्दोष है - इसकी मुझे चिन्ता नहीं है। निश्चय रूप से जिस भक्त को आपकी भक्ति होगी वह अवश्य इस स्तोत्र को पढ़ेगा। अपने हृदय में अपनी लघुता का पूर्ण रूप से ज्ञान होने पर भी मैंने इस स्तुति की रचना केवल भक्त होने के नाते वाचाल बन कर हठ से अर्थात् भक्ति पर वश होकर हो रची है।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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