अध्याय 1 — लघुस्तवः
पञ्चस्तवी
21 श्लोक • केवल अनुवाद
हे चण्डिका भगवती ! जिन व्यक्तियों के हाथों ने आपके चरण-कमलों को पूजा करने के लिए बिल्वपत्रों को काटते हुए (उस बिल्व वृक्ष में स्थित) कांटों के तीखे अग्रभाग के चुभने से उत्पन्न दुःख का अनुभव न किया हो, वे जन भला (आगामी जन्म में) दण्ड, अंकुश, चक्र, धनुष, वज्र, लक्ष्मी तथा मछली की आकृतियों से अंकित कमल के समान हाथों से युक्त चक्रवर्ती सम्राट् किस भांति बन सकते हैं। कहने का भाव यह है कि जो भक्त, जगज्जननी की, पूजा के लिए अनेक कष्टों को सहन करता है उसी के हाथ दूसरे जन्म में दण्ड आदि चिन्हों से युक्त होते हैं, जिसके फलस्वरूप वह सम्राट् बनने की योग्यता रखता है। (शस्त्रों का कहना है कि जिस व्यक्ति के हाथों में - दण्ड, अंकुश, चक्र, धनुष, वज्र, लक्ष्मी तथा मत्स्य - इनमें से किसी एक का भी चिन्ह अंकित हुआ हो, वह निःसन्देह चक्रवर्ती राजा बन जाता है। स्मरण रहे कि ऐसा चक्रवर्ती सम्राट् जगन्माता की कृपा से ही होता है)
'ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र' - तीन देवताओं का वर्ग, 'ऋक, यजु, साम' - वेदत्रयी, अग्नि देवता की तीन शक्तियां - 'गार्हपत्य, आहवनीय, दक्षिणाग्नि', तीन स्वर - 'उदात्त, अनुदात्त, स्वरित', तीन लोक - 'भूः, भुवः, स्वः', गायत्री के तीन पद - 'भूः, भुवः, स्वः', ज्योतिष शास्त्र में वर्णित तीन पुष्कर - योग, तीन ब्रह्म - ओं, तत् सत्' और तीन वर्ण - 'अ, उ, म' - इसी भांति संसार में जो भी तीन-तीन रूप वाली वस्तु नियमित कही गई हैं, वह सभी 'त्रिपुरा' अर्थात् तीन स्वरूपों को पूर्ण करने वाली भगवती के नाम के ही अनुगामी अर्थात् परिचायक हैं।
हे देवी ! आप माया रूप हैं, कुण्डलिनी के स्वरूप वाली हैं, मधुमती नामक योगसंबंधी भूमिका हैं, (इस मधुमती भूमिका में जाकर योगियों के सम्मुख अपनी करणेश्वरी-देवियां वर देने के लिये उपस्थित हो जाती हैं) आप काली भगवती हैं, आप निवृति, प्रतिष्ठा, विद्या, शान्ता तथा शान्तातीता नामक पांच कलाओं का स्वरूप बनी हुई हैं, नकार वर्ण से लेकर फकार तक मालिनी-रूप हैं। दस महाविद्यालयों में से आप मातंगी-विद्या-स्वरूप हैं। आप विजया, जया, भगवती, देवी, पार्वती तथा शम्भु-पत्नी हैं। आप शक्ति-स्वरूप हैं। शंकर भगवान् की प्रिया हैं। तीन नेत्रों वाली हैं। आप सरस्वती हैं। आप भैरव नाथ की शक्ति हैं। आप हींकार-रूपा हैं। तीन अवस्थाओं को पूर्ण करने वाली त्रिपुरा हैं। भोग तथा मोक्ष को देने वाली हैं। आप माता जगज्जननी हैं और भेदरूप माया का नाश करने वाली कुमारी हैं।