मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
पञ्चस्तवी • अध्याय 1 • श्लोक 7
वामे पुस्तकधारिणीमभयदां साक्षत्रजं दक्षिणे भक्तेभ्यो वरदानपेशलकरां कर्पूरकुन्दोज्ज्वलाम्। उज्जृम्भाम्बुजपत्रकान्तनयनस्निग्धप्रभालोकिनीं ये त्वामऽम्ब न शीलयन्ति मनसा तेषां कवित्वं कुतः ।।
हे माता ! (आपका स्वरूप चार भुजाओं से युक्त है) आप बायें हाथ में पुस्तक को धारण किये हुए हैं, दूसरे बायें हाथ में अभय-मुद्रा को दिखा रही हैं। ऊपर के दाहिने हाथ में अक्षमाला (जप-माला) को लिये हुई हैं तथा चौथा हाथ भक्तों को वर देने के कारण कोमल बना हुआ है। इसके अतिरिक्त आप काफूर तथा कुन्द-फूल की भांति उज्ज्वल तथा विकसित कमल-पत्र के समान सुन्दर नेत्रों से युक्त प्रेममयो अनुग्रह-दृष्टि रखती हैं। जो जन आपके ऊपर वर्णित स्वरूप का ध्यान मन से कदापि नहीं करते, भला उनको पाण्डित्य कैसे और क्यों प्राप्त हो सकता है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
पञ्चस्तवी के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

पञ्चस्तवी के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें