मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
पञ्चस्तवी • अध्याय 1 • श्लोक 14
विप्राः क्षोणिभुजो विशस्तदितरे क्षीराज्यमध्वासवै- स्त्वां देवि ! त्रिपुरे ! पराऽपरमयीं सन्तर्ज्य पूजाविधौ । यां यां प्रार्थयते मनः स्थिरधियां तेषां ते एव ध्रुवं तां तां सिद्धिमवाप्नुवन्ति तरसा विप्रैरविघ्नीकृताः ।।
हे देवी ! हे त्रिपुरा भगवती ! (आप के भक्त-जन) ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र क्रम से दूध, घी, शहद तथा मदिरा से आप (विश्वोत्तीर्णा और विश्वमयी) देवी की पूजा करके आपको सन्तुष्ट करते हैं। उसके फलस्वरूप उन स्थिरबुद्धि वालों का मन जिस भी यथाभिलषित वस्तु की याचना आपके सम्मुख करता है वे अभीष्ट सिद्धियां उसे निर्विघ्न बनकर प्राप्त होती हैं।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
पञ्चस्तवी के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

पञ्चस्तवी के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें