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पञ्चस्तवी • अध्याय 1 • श्लोक 15
शब्दानां जननी त्वमत्र भुवने वाग्वादिनीत्युच्यसे त्वत्तः केशववासव प्रभृतयोऽप्याविर्भवन्ति स्फुटम्। लीयन्ते खलु यत्र कल्पविरमे ब्रह्मादयस्तेऽप्यमी सा त्वं काचिदचिन्त्यरूपमहिमा शक्तिः परा गीयसे ।।
हे देवी ! इस संसार में आप समस्त शब्द-भण्डार की जननी अर्थात् कारण हैं। आपको वाग्वादिनी अर्थात् सरस्वती कहते हैं। आपके स्वरूप से ही नारायण, इन्द्र आदि देवता भी प्रत्यक्ष रूप से प्रकट होते हैं। कल्प के अन्त में वे सभी ब्रह्मादि देवता-गण तथ्यतः आपके स्वरूप में लीन होते हैं अर्थात् अपनी स्थिति को खो बैठते हैं। वही आपका अचिन्त्य महिमा वाला स्वरूप परा शक्ति के नाम से कहा जाता है।
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