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पञ्चस्तवी • अध्याय 1 • श्लोक 17
लक्ष्मीं राजकुले जयां रणभुवि क्षेमङ्करीमध्वनि क्रव्यादद्विपसर्पभाजि शवरीं कान्तारदुर्गे गिरौ। भूतप्रेतपिशाचजम्बुकभये स्मृत्वा महाभैरवीं व्यामोहे त्रिपुरां तरन्ति विपदस्तारां च तोयप्लवे ।।
राज-कुल में साक्षात् 'लक्ष्मी' की भांति, भयंकर युद्ध-भूमि में जय-प्रदा 'विजया' की भांति, दुःख-ग्रस्त संसार में कल्याणस्वरूप वाली 'क्षेमंकरी' की भांति, आम-मांस-भक्षक सिंह तथा हाथी और सांप आदि भयंकर प्राणियों से घिरे हुए कठिन दुर्गम जंगलों से युक्त पर्वतस्थानों में आपको रक्षा करने वाली 'भीलिनी' के समान, भूत, प्रेत, पिशाच और गीदड़ों के भय में 'महाभैरवी' के समान, सांसारिक मोह में 'त्रिपुरा' का स्वरूप बनी हुई और संकट रूपी विस्तृत जल से युक्त समुद्र में 'तारा' (नौका) के समान बनी हुई जो मनुष्य आपका स्मरण करते हैं, वे उपरोक्त सभी आपदाओं से छूट जाते हैं।
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