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पञ्चस्तवी • अध्याय 1 • श्लोक 3
दृष्ट्वा संभ्रमकारि वस्तुसहसा ऐ ऐ इति व्याहतम् येनाऽकृतवशादऽपीह वरदे ! बिन्दु विनाप्यक्षरम्। तस्यापि ध्रुवमेव देवि तरसा जाते तवानुग्रहे वाचः सूक्तिसुधारसद्रवमुचो निर्यान्ति वक्त्राम्बुजात् ।।
हे अभीष्ट वर को देने वाली देवी। जिस व्यक्ति ने कोई भयप्रद वस्तु शेर सांप आदि देख कर बिना किसी अभिप्राय से भय-यशात् ही ऐ ऐ अक्षर का बिन्दु के बिना ही उच्चारण किया हो ऐसे व्यक्ति पर भी यदि आप अनुग्रह करें तो निःसन्देह उस व्यक्ति के मुख-कमल से उसी क्षण ऐसी कविता प्रकट होती है जो कि अमृत-रस-धाराओं की परिचायक होती हैं। अभिप्राय यह है कि भगवती के प्रथम बीजाक्षर 'ऐं' की इतनी महिमा है कि यदि कोई व्यक्ति भूल से भी 'ऐ ऐ' - का ही उच्चारण करे तो उसे भगवती अपूर्व कवित्व-शक्ति प्रदान करती हैं।
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