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पञ्चस्तवी • अध्याय 1 • श्लोक 9
ये सिन्दूरपरागपुञ्जपिहितां त्वत्तेजसा द्यामिमा- मुर्वीचापि विलीनयावकरसप्रस्तारमग्नामिव । पश्यन्ति क्षणमप्यऽनन्यमनसस्तेषामनङ्गज्वर- क्लान्तास्त्रस्तकुरङ्गशावकदृशोवश्याः भवन्ति स्फुटम् ।।
जो व्यक्ति एकाग्र मन से आपके अरुण-वर्ण तेज के द्वारा इस आकाश को सिन्दूर की धूलि के समूह से रंजित बनी हुई तथा इस पृथ्वी को पिघले हुए लाख के रस में सनी हुई जैसी देखते हैं अर्थात् आकाश और पृथ्वी में व्याप्त बने हुए आपके अरुण-वर्ण-स्वरूप का साक्षात्कार एक क्षण के लिये भी करते हैं, उनको संकल्प-विकल्प के कारण दुःखी बनी हुई (अपनी) इन्द्रियां उसी भांति वश हो जाती हैं, जिस भांति स्वभावतः चञ्चल और डरपोक हिरण के बच्चों की दृष्टि किसी शेर आदि को देखकर आप ही आप सहम जाती है।
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