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पञ्चस्तवी • अध्याय 1 • श्लोक 18
माया कुण्डलिनी क्रिया मधुमती काली कला मालिनी मातङ्गी विजया जया भगवती देवी शिवा शाम्भवी । शक्तिः शङ्करवल्लभा त्रिनयना वाग्वादिनी भैरवी ह्रींकारी त्रिपुरा परापरमयी माता कुमारीत्यसि ।।
हे देवी ! आप माया रूप हैं, कुण्डलिनी के स्वरूप वाली हैं, मधुमती नामक योगसंबंधी भूमिका हैं, (इस मधुमती भूमिका में जाकर योगियों के सम्मुख अपनी करणेश्वरी-देवियां वर देने के लिये उपस्थित हो जाती हैं) आप काली भगवती हैं, आप निवृति, प्रतिष्ठा, विद्या, शान्ता तथा शान्तातीता नामक पांच कलाओं का स्वरूप बनी हुई हैं, नकार वर्ण से लेकर फकार तक मालिनी-रूप हैं। दस महाविद्यालयों में से आप मातंगी-विद्या-स्वरूप हैं। आप विजया, जया, भगवती, देवी, पार्वती तथा शम्भु-पत्नी हैं। आप शक्ति-स्वरूप हैं। शंकर भगवान् की प्रिया हैं। तीन नेत्रों वाली हैं। आप सरस्वती हैं। आप भैरव नाथ की शक्ति हैं। आप हींकार-रूपा हैं। तीन अवस्थाओं को पूर्ण करने वाली त्रिपुरा हैं। भोग तथा मोक्ष को देने वाली हैं। आप माता जगज्जननी हैं और भेदरूप माया का नाश करने वाली कुमारी हैं।
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