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पञ्चस्तवी • अध्याय 1 • श्लोक 10
चञ्चत्कांचन कुण्डलाङ्गदधरामाबद्धकाञ्चीत्रजं ये त्वां चेतसि तद्गतेक्षणमपि ध्यायन्ति कृत्वा स्थितिम् । तेषां वेश्मसु विभ्रमादहरहः स्फारी भवन्त्यश्चिरं माद्यत्कुञ्जरकर्णतालतरलाः स्थैर्यं भजन्ते श्रियः ।।
जो व्यक्ति एकाग्र बने हुए हृदय में आपका स्वरूप चमकीले स्वर्ण-कुण्डलों से युक्त, बाजूबन्द को धारण किये हुए तथा सोने का गजरा बान्चे हुए स्वरूप से युक्त आपका ध्यान एक क्षण के लिये ही करते हैं, उनके घरों में मद-मस्त हाथी के चञ्चल कानों की भांति सदा चलायमान और इसीलिये अस्थिर बनी हुई भी लक्ष्मी (संपदा) बहुत समय के लिये विपुल-रूप से सदैव स्थिर रूपता से अपना स्थान बना लेती है। भाव यह है कि आप के भक्तों के घर से लक्ष्मी कभी भी जाने का नाम नहीं लेती है, अतः वे सदा समृद्धिशाली बने रहते हैं।
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