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पञ्चस्तवी • अध्याय 1 • श्लोक 2
या मात्रा त्रुपसीलतातनुलसत्तन्तूत्थितिस्पर्धिनी वाग्बीजे प्रथमे स्थिता तव सदा तां मन्महे ते वयम्। शक्तिः कुण्डलिनीति विश्वजननव्यापारबद्धोद्यमा ज्ञात्वेत्थं न पुनःस्पृशन्ति जननीगर्भेऽर्भकत्वं नराः ।।
आपके प्रथम-बीजाक्षर (एँ) में जो आपको उत्कृष्ट कला, त्रपुसी नामक लता-विशेष के अत्ति सूक्ष्म तन्तुओं के समान विकास को प्राप्त हुई तथा उस के साथ होड़ अर्थात् बराबरी करने पर तुली हुई है, उसे हम जगत् को उत्पन्न करने के कार्य में कटिबद्ध बनी हुई आपकी ही कुण्डलिनी शक्ति मानते हैं। इस प्रकार (आपकी कुण्डलिनी-शक्ति के) स्वरूप को जानकर अर्थात् अनुभव करके मनुष्य मां के गर्भ में बालक-भाव को कदापि स्पर्श नहीं करते हैं, अर्थात् वे सदा के लिये जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होते हैं।
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