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पञ्चस्तवी • अध्याय 1 • श्लोक 11
आर्भटचाशशिखण्डमण्डितजटाजूटां नृमुण्डस्त्रजं बन्धूककुसुमारुणाम्बरधरां प्रेतासनाध्यासिनीम्। त्वां ध्यायन्ति चतुर्भुजां त्रिनयनामापीनतुङ्गस्तनीं मध्ये निम्नवलित्रयाङ्किततनुं त्वद्रूप संवित्तये ।।
हे देवी ! आपकी जटाओं के समूह पर चन्द्रमा का (अर्घाकार) खण्ड ऐसा शोभित होता है मानो आप ने किनारी की बन्धी बान्ध रक्खी है। गले में आपने मरे हुए मनुष्यों के सिरों की माला धारण की है। आप बन्धूक नामक फूलों की तरह लाल वस्त्रों को धारण करती हैं और आप शिव रूपी शव का आसन बना कर उस पर बैठी हैं। आप चार भुजाओं वाली हैं। तीन नेत्रों वाली हैं। बड़े और उन्नत वक्षस्थल अर्थात् ज्ञान और क्रिया से युक्त आपका स्वरूप है तथा इन्हीं आपके ज्ञान-क्रिया रूपी स्तनों के मध्य में तीन गहरी भव-अभव और अतिभव रूपी कुण्डलाकार लकीरें सुशोभित हुई हैं - इस प्रकार आपके स्वरूप का साक्षात्कार करने के लिये भक्तजन आपका ध्यान वीरात्मक लास्यवृत्ति में सदा करते रहते हैं।
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