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पञ्चस्तवी • अध्याय 1 • श्लोक 12
जातोऽप्यऽल्पपरिच्छदे क्षितिभुजां सामान्यमात्रे कुले निःशेषावनिचक्रवर्ति पदवीं लब्ध्वा प्रतापोन्नतः। यद्विष्द्याधर वृन्दवन्दितपदः श्रीवत्सराजोऽभवत् देवि ! त्वच्चरणाम्बुज प्रणतिजः सोऽयं प्रसादोदयः ।।
राजाओं के साधारण कुल में एक सामान्य राजसेवक के रूप में उत्पन्न होने पर भी जो 'वत्सराज' नामक सम्राट् सम्पूर्ण पृथ्वी पर चक्रवर्ति-पदवी को प्राप्त करके ऐश्वर्य से उन्नत मस्तक वाला बना और जिसके चरणों की वन्दना (नित-प्रति) विद्याधरों का समूह करने लगा। हे जगन्माता। (सच तो यह है कि) उस का सभी यह ऐश्वर्य आपके चरण कमलों में नत-मस्तक रहने से उत्पन्न आपके ही अनुग्रह का प्रत्यक्ष फल था।
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