राजाओं के साधारण कुल में एक सामान्य राजसेवक के रूप में उत्पन्न होने पर भी जो 'वत्सराज' नामक सम्राट् सम्पूर्ण पृथ्वी पर चक्रवर्ति-पदवी को प्राप्त करके ऐश्वर्य से उन्नत मस्तक वाला बना और जिसके चरणों की वन्दना (नित-प्रति) विद्याधरों का समूह करने लगा। हे जगन्माता। (सच तो यह है कि) उस का सभी यह ऐश्वर्य आपके चरण कमलों में नत-मस्तक रहने से उत्पन्न आपके ही अनुग्रह का प्रत्यक्ष फल था।
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