मेरी यह स्तुति सदोष है या निर्दोष है - इसकी मुझे चिन्ता नहीं है। निश्चय रूप से जिस भक्त को आपकी भक्ति होगी वह अवश्य इस स्तोत्र को पढ़ेगा। अपने हृदय में अपनी लघुता का पूर्ण रूप से ज्ञान होने पर भी मैंने इस स्तुति की रचना केवल भक्त होने के नाते वाचाल बन कर हठ से अर्थात् भक्ति पर वश होकर हो रची है।
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