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पञ्चस्तवी • अध्याय 1 • श्लोक 21
सावद्यं निरवद्यमस्तु यदि वा किं बानया चिन्तया नूनं स्तोत्रमिदं पठिष्यति नरो यस्यास्ति भक्तिस्त्वयि । संश्चिन्त्यापि लघुत्वमात्मनि हडं सञ्जायमानं हठात्त्वद्भक्त्या मुखरी कृतेन रचितं यस्मान्मयापि स्फुटम्।। इति पञ्चस्तव्यां लघुस्तवः प्रथमः ।।
मेरी यह स्तुति सदोष है या निर्दोष है - इसकी मुझे चिन्ता नहीं है। निश्चय रूप से जिस भक्त को आपकी भक्ति होगी वह अवश्य इस स्तोत्र को पढ़ेगा। अपने हृदय में अपनी लघुता का पूर्ण रूप से ज्ञान होने पर भी मैंने इस स्तुति की रचना केवल भक्त होने के नाते वाचाल बन कर हठ से अर्थात् भक्ति पर वश होकर हो रची है।
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