एकैकं तव देवि बीजमनघं सव्यञ्जनाव्यञ्जनं कूटस्थं यदि वा पृथक्क्रमगतं यद्वा स्थितं व्युत्क्रमात्। यं यं काममपेक्ष्य येन विधिना केनापि वा चिन्तितं जप्तं वा सफलीकरोति सहसा तं तं समस्तं नृणाम् ।।
हे देवि ! 'ऐं' क्लीं' 'सौः' इनमें से आपका प्रत्येक निष्पाप बीजाक्षर व्यञ्जन सहित (ऐं, क्लीं, सौः), व्यञ्जन रहित (ऐ, ई, औः) या कूटस्थ (एँ-क्लीं-सौः), अथवा भिन्न क्रम में ठहरा हुआ ऐं, अथवा क्लीं या केवल सौः, या उलटे क्रम से (सौः- क्लीं-ऐं) जिस किसी विधि से जो कोई व्यक्ति ध्यान करता है अथवा उसका जप करता है, उन मनुष्यों की सभी अभिलाषाओं को वह बीजाक्षर उसी क्षण सफल बना देता है।
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