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पञ्चस्तवी • अध्याय 1 • श्लोक 5
यत्सद्यो वचसां प्रवृत्तिकरणे दृष्टप्रभावं बुधैः तार्तीयीकमहं नमामि मनसा त्वद्बीजमिन्दुप्रभम्। अस्त्वौर्वोऽपि सरस्वतीमनुगतो जाडचाम्बुविच्छित्तये गोशब्दो गिरि वर्तते स नियतं यो गं विना सिद्धिदः।।
मैं चन्द्र-तुल्य-दीप्ति से युक्त आपके उस तीसरे बीजाक्षर (सौः) को मन से नमस्कार करता हूँ, जिसका प्रभाव ज्ञानी-जनों ने क्षण-मात्र में देखा है जिस के फलस्वरूप उनकी वाणियों में निरर्गल कवित्व-शक्ति प्राप्त होती है। वह सरस्वती को सिद्ध कराने वाला (सौः) मन्त्र अज्ञानरूपी जल को भस्म करने में वाडवाग्नि के समान बन जाता है, तथा उस सारस्वत (सौः) की छाया का अनुकरण करने वाला (गौ) शब्द, जो वाणी के अर्थ में प्रयुक्त होता है ग के बिना औ के रूप से ही सिद्धि-प्रद बन जाता है। अथवा इसका दूसरा अर्थ यह भी हो सकता है कि यह सरस्वती का बीजाक्षर योग क्रिया करने के बिना ही अभीष्ट-सिद्धि प्रदान करता है।
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