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पञ्चस्तवी • अध्याय 1 • श्लोक 19
आईपल्लवितैपरस्परयुतैर्द्वित्रि क्रमाद्यक्षरैः काद्यैः क्षान्तगतैः स्वरादिभिरथो क्षान्तैश्च तैः सस्वरैः । नामानि त्रिपुरे ! भवन्ति खलु यान्यत्यन्त गुह्यानि ते तेभ्यो भैरवपत्नि ! विंशतिसहस्त्रेभ्यः परेभ्यो नमः ।।
हे तीनों लोकों को पूर्ण करने वाली देवी! हे भैरव-पत्नि ! जो आपके अत्यन्त रहस्य बने हुए (बीजाक्षर) रूप में नाम हैं, वे आ, ई स्वरों रूपी पत्तों से युक्त हैं। दो, तीन वर्षों के क्रम से संयुक्त रूप वाले हैं। ककार से लेकर क्षकार अन्त वाले हैं। स्वरों से युक्त हैं अथवा स्वरों से युक्त क्षकार अन्त वाले हैं अर्थात् अक्षहीं नफहीं वाले हैं। उन आपके अति उत्कृष्ट बीस हजार नामों को हमारा प्रणाम हो।।
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