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पञ्चस्तवी • अध्याय 1 • श्लोक 8
ये त्वां पाण्डुर पुण्डरीकपटलस्पष्टाभिरामप्रभां सिञ्चन्तीमऽमृतद्रवैरिव शिरो ध्यायन्ति मूर्हिन स्थिताम्। अश्रान्तं विकटस्फुटाक्षरपदा निर्यान्ति वक्त्राम्बुजा- त्तेषां भारति! भारती सुरसरित्कल्लोललोलोर्मिवत् ।।
हे सरस्वती देवी। आप सफेद पुण्डरीक कमल के समूह की भांति स्पष्ट (निर्मल) तथा सुन्दर दीप्ति से युक्त हैं। आप ऐसी प्रतीत होती हैं, मानो बहते हुए अमृत के द्वारा भक्तों को सिंचन करती हैं। ऐसे आपके स्वरूप का ध्यान जो भाग्यशाली व्यक्ति करते हैं, उनके मुख-कमल से गंगा नदी की गहन तथा (चंचल) प्रवहन-शील लहरों की भांति उछलती हुई, सुन्दर स्पष्ट अक्षरों तथा पदों से युक्त वाणी अर्थात् कविता अनथक रूप से प्रसरित होती है।
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