चण्डि । त्वच्चरणाम्बुजार्चनविधौ बिल्वीदलोल्लुण्ठन- त्रुटचत्कण्टककोटिभिः परिचर्य येषां न जग्मुः कराः। ते दण्डाङ्कुशचक्रचापकुलिशश्रीवत्समत्स्याङ्कितै- र्जायन्ते पृथिवीभुजः कथमिवाम्भोजप्रभैः पाणिभिः ।।
हे चण्डिका भगवती ! जिन व्यक्तियों के हाथों ने आपके चरण-कमलों को पूजा करने के लिए बिल्वपत्रों को काटते हुए (उस बिल्व वृक्ष में स्थित) कांटों के तीखे अग्रभाग के चुभने से उत्पन्न दुःख का अनुभव न किया हो, वे जन भला (आगामी जन्म में) दण्ड, अंकुश, चक्र, धनुष, वज्र, लक्ष्मी तथा मछली की आकृतियों से अंकित कमल के समान हाथों से युक्त चक्रवर्ती सम्राट् किस भांति बन सकते हैं। कहने का भाव यह है कि जो भक्त, जगज्जननी की, पूजा के लिए अनेक कष्टों को सहन करता है उसी के हाथ दूसरे जन्म में दण्ड आदि चिन्हों से युक्त होते हैं, जिसके फलस्वरूप वह सम्राट् बनने की योग्यता रखता है। (शस्त्रों का कहना है कि जिस व्यक्ति के हाथों में - दण्ड, अंकुश, चक्र, धनुष, वज्र, लक्ष्मी तथा मत्स्य - इनमें से किसी एक का भी चिन्ह अंकित हुआ हो, वह निःसन्देह चक्रवर्ती राजा बन जाता है। स्मरण रहे कि ऐसा चक्रवर्ती सम्राट् जगन्माता की कृपा से ही होता है)
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