अध्याय 2 — मधुकैटभवध:
दुर्गासप्तशती
107 श्लोक • केवल अनुवाद
विनियोग:
इस प्रथम चरित्र के मन्त्र के ऋषि ब्रह्मा हैं, देवता महाकाली हैं और छन्द गायत्री है।
नन्दा इसकी शक्ति है, रक्तदन्तिका बीज है और अग्नि इसका तत्त्व है।
यह ऋग्वेदस्वरूप है और श्री महाकाली की प्रसन्नता के लिए प्रथम चरित्र के जप में इसका विनियोग किया जाता है।
ध्यान:
मैं उस महाकालिका की उपासना करता हूँ जिनके हाथों में खड्ग, चक्र, गदा, धनुष, परिघ, शूल, भुशुण्डी, शिर और शंख हैं, जो त्रिनेत्र वाली और समस्त आभूषणों से अलंकृत हैं।
जिनका वर्ण नीलमणि के समान है और जिनके अनेक मुख तथा चरण हैं।
जब भगवान विष्णु निद्रा में थे तब कमल से उत्पन्न ब्रह्मा ने मधु और कैटभ के वध के लिए जिनकी स्तुति की थी।
चण्डिका देवी को नमस्कार।
मार्कण्डेय ऋषि ने कहा—