पतिस्वजनहार्दं च हार्दितेष्वेव मे मनः । किमेतन्नाभिजानामि जानन्नपि महामते ॥
पत्नी और स्वजनों के प्रति स्नेह रखने वाला मेरा मन उन्हीं से जुड़ा रहता है। हे महामति! यह क्या है, मैं समझ नहीं पाता, यद्यपि जानता हूँ।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
दुर्गासप्तशती के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
दुर्गासप्तशती के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।