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दुर्गासप्तशती • अध्याय 2 • श्लोक 32
पतिस्वजनहार्दं च हार्दितेष्वेव मे मनः । किमेतन्नाभिजानामि जानन्नपि महामते ॥
पत्नी और स्वजनों के प्रति स्नेह रखने वाला मेरा मन उन्हीं से जुड़ा रहता है। हे महामति! यह क्या है, मैं समझ नहीं पाता, यद्यपि जानता हूँ।
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