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दुर्गासप्तशती • अध्याय 2 • श्लोक 37
समाधिर्नाम वैश्योऽसौ स च पार्थिवसत्तमः । कृत्वा तु तौ यथान्यायं यथार्हं तेन संविदम् ॥
वह वैश्य समाधि नाम का था और दूसरा श्रेष्ठ राजा था। उन दोनों ने मुनि से उचित रीति से वार्तालाप किया।
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