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दुर्गासप्तशती • अध्याय 2 • श्लोक 75
त्वमेव सन्ध्या सावित्री त्वं देवि जननी परा । त्वयैतद्धार्यते विश्वं त्वयैतत् सृज्यते जगत् ॥
हे देवी! आप ही संध्या हैं, आप ही सावित्री हैं और आप ही परम जननी हैं। आप ही इस विश्व को धारण करती हैं और आप ही इस जगत की सृष्टि करती हैं।
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