यत्प्रेमप्रवणं चित्तं विगुणेष्वपि बन्धुषु । तेषां कृते मे निःश्वासो दौर्मनस्यं च जायते ॥
मेरा चित्त अपने दोषयुक्त बन्धुओं के प्रति भी प्रेम से झुका रहता है और उनके कारण मुझे गहरी साँसें और दुःख उत्पन्न होता है।
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