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अध्याय 70 — अथ कन्यालक्षणाध्यायः
बृहत्संहिता
26 श्लोक • केवल अनुवाद
जिस कन्या के पाँव स्निग्ध, ऊंचे, आगे से पतले और लाल नखों से युत, समान, पुष्ट, सुन्दर और छिपे हुये गुल्फ वाले, मिली हुई अंगुली वाले तथा कमल की कान्ति के समान कान्ति वाले हों; उससे पृथ्वीपतित्व की कामना रखा वाले मनुष्य को विवाह करना चाहिये ।
जिस कन्या के पसीने से रहित कोमल पादतल में मत्स्य, अंकुश, कमल, जौ, वज्र, हल और खड्ग के समान रेखा हो; रोमहीन नाड़ियों से रहित, सुन्दर और गोल जङ्घा हो
स्थूल सन्धि वाले समान जानु हों; घने, हाथी के सूँड़ के समान और रोमरहित ऊरु हो; पीपल के पत्ते के समान विस्तीर्ण भग हो; कडुये के पृष्ठ के समान विस्तीर्ण कटिप्रदेश हो और छिपी हुई मणि हो, वह बहुत लक्ष्मी प्रदान करती है।
जिन तियों के विस्तीर्ण, पुष्ट, भारी और काश्चीकलाप से युत नितम्ब हों, गम्भीर, विस्तीर्ण और दक्षिणावर्त नाभि हो, वे शुभ होती हैं।
जिस ती का मध्यभाग त्रिवलि से युत और रोमरहित हो, गोल, पुष्ट, समान और कठोर दोनों स्तन हों, रोमरहित और कोमल छाती हो तथा शङ्कु के समान तीन रेखाओं से युत कण्ठ हो, वह धन और सुख प्रदान करती है ।
बन्धुजीव पुष्प के समान और सुन्दर बिम्बफल के समान अधर तथा कुन्दपुष्प के समान दाँत स्त्रियों को पतिसुख और बहुत धन देते हैं।
सरस, शठता से रहित, कोकिल या हंस के समान मधुर और दीनतारहित स्त्री का वचन अधिक सुखद होता है। समान, समान पुटों से युत और सुन्दर स्त्री की नासिका प्रशस्त होती है तथा नील कमल की कान्ति को हरण करने वाली स्त्री को दृष्टि शुभ
विना मिले, न बहुत चौड़े, न बहुत लम्बे और बाल चन्द्र के समान वक्र स्त्री के घू शुभ होते हैं तथा अर्धचन्द्र के समान, रोमरहित और न नत-न उत्रत (समान) ती का ललाट शुभ होता है।
ती के अल्प मांसयुत, कोमल, समान और संलग्न दोनों कान शुभ होते हैं। स्निग्ध, अतिकृष्ण, कोमल, कुटिल और एक रोमकूप में एक रोम सुख देने वाले होते है तथा समान (न नीचा, न ऊँचा शिर शुभ होता है।
जिस त्रो के पादतल या पाणितल में भृङ्गार (झारी), आसन, पोड़ा, हाथी, रथ, बिल्ववृक्ष, यज्ञस्तम्भ, शर, माला, कुण्डल, चामर, अंकुश, जौ, पर्वत, ध्वज, तोरण, मत्स्य, स्वस्तिक, यज्ञवेदी, पंखा, शंख, छत्र और कमल के समान रेखायें हों, वह रानी होती है।
रानी के हाथ नवीन कमलगर्भ के समान पतले और लम्बे पर्षों वाली अंगुलियों में युत और छिपे हुये मणिबन्ध वाले होते हैं। साथ ही नीचा न ऊँचा और उत्तम रेखाओं से युत करतल वाली स्त्री अविधवा पुत्रसुख और धन एवं सम्भोगसुख से समन्ति होती है।
श्री या पुरुष के मणिलेकर मध्यम अंत तक रेखा और पाताल में ऊर्जा देखा होती है, यह राज्यमुख के लिये होती है।
कनिष्ठिका के मूल से प्रदेशिनी और मध्यमा के मध्य में गई हुई पूरी रेखा हो तो परमायु और छोटी हो तो परमायु से अल्प आयु प्रदान करने वाली होती है।
अंगूठे की मूल में सन्तान की रेखा होती है। उनमें जितनी बड़ी रेखा हो, उतने पुत्र और जितनी छोटी रेखा हो, उतनी कन्यायें होती हैं। साथ ही मध्य में विना टूटी हुई रेखा दीर्घायु वाले सन्तान कों और टूटी हुई रेखा अल्पायु वाले सन्तान की होती है ।
इस प्रकार ये त्रियों के शुभ लक्षण कहे गये हैं। इनसे विपरीत लक्षण अशुभ होते हैं। अब विशेष करके जो अशुभ लक्षण हैं; उनको मैं कहता हूँ।
जिस स्त्री के पाँव को कनिष्ठिका या अनामिका भूमि को स्पर्श न करे, अँगूठे से लम्बी तर्जनी हो, वह व्यभिचारिणी और अति पापिनी होती है।
ऊपर को खिंची हुई पिण्डिका (जंघा के पश्चिम भाग) वाली, नाड़ियों से व्याप्त, सूखी, रोमों से युत या अधिक पुष्ट जंघा, वामावर्त रोमों से युत, निम्न और छोटी भग तथा घड़े के समान पेट दुःख भोगने वाली खियों की होती है।
छोटी गरदन वाली खी निर्धन, बहुत लम्बी गरदन वाली कुलक्षय करने वाली और मोटी गरदन वाली खो क्रूर प्रकृति को होती है।
जिस ली के नेत्र केकर (कड़ा ऐंचाताना), पीले, श्याम या चञ्चल हों, वह बुरे स्वभाव वाली होती है तथा जिसके हँसने के समय गालों में गड्ढे पड़ जाते हों, वह व्यभिचारिणी होती है।
जिस स्त्री का ललाट लम्बा हो यह अपने देवर का, उदर लम्बा हो वह अपने बसुर का और स्फिक् (कुल्ला कटिप्रोच) लम्बा हो यह अपने पति का वध करती है तथा जिसके ऊपरी ओठ में अधिक रोम हों और जो बहुत लम्बी हो, यह पति के लिए शुभदायक नहीं होती है।
जिस ली के स्तन और कान रोममुक्त, भलिन, अभद्र और छोटे-बड़े हो, वह क्लेस भोगने वाली होती है तथा जिसके मोटे बाहर निकले विषम और कांस मे मुक्कदाँत हो, वह और होती है।
जिस ली के हाथ में मांस खाने वाले (गीष आदि) पक्षी, भेड़िया, कौवा, केक, सर्प या उल्लू के समान रेखा हो अथवा सूखे, नाहियों से व्याप्त और छोटे-बड़े हाथ हो, यह श्री सुख और धन से हीन होती है।
जिस खो के ऊपर का ओठ ऊँचा हो या केशों के अग्र भाग रूखे हों, यह कलह- प्रिया होती है। अधिकतर कुरूपा खियों में दोष और सुन्दरी में गुण होते हैं।
अब कालिक शुभाशुभ फल-ज्ञान के लिये शरीर के दश भाग कहते हैं। जैसे- गुल्फसहित पाँव पहला भाग; जानुचक्रसहित जंघा दूसरा भाग; लिंग, ऊरु और अण्डकोश तीसरा भाग; नाभि और कमर चौथा भाग
उदरं कथयन्ति पञ्चमं हृदयं षष्ठमतस्तनान्वितम् । अथ सप्तममंसजत्रुणी कथयन्त्यष्टममोष्ठकन्यरे ॥ नेत्र नाँ भाग तथा ललाटसहित सिर दशाँ भाग होता है।
इसी तरह परमायु ( १२०) का भी दश भाग करना चाहिये। यदि अंग का प्रथम भाग शुभ लक्षणों से युत हो तो आयु के प्रथम भाग में शुभ और अशुभ लक्षणों से युत हो तो आयु के प्रथम भाग में अशुभ फल कहना चाहिये। इसी तरह द्वितीय पुदि अंगभाग शुभाशुभ लक्षणों से युत हो तो आयु के द्वितीय आदि भाग में शुभाशुभ फल कहना चाहिये।
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