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बृहत्संहिता • अध्याय 70 • श्लोक 2
मत्स्यानुशाब्जयववग्रहलासिचिह्ना- वस्वेदनौ मृदुतलौ चरणौ प्रशस्तौ । जते च रोमरहिते विशिरे सुवृत्ते जानुद्वयं सममनुल्वणसन्धिदेशम् ॥
जिस कन्या के पसीने से रहित कोमल पादतल में मत्स्य, अंकुश, कमल, जौ, वज्र, हल और खड्ग के समान रेखा हो; रोमहीन नाड़ियों से रहित, सुन्दर और गोल जङ्घा हो
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