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बृहत्संहिता • अध्याय 70 • श्लोक 19
नेत्रे बस्याः केकरे पिङ्गले वा सा दुःशीला श्यावलोलेक्षणा च। कूपौ यस्या गण्डयोश्च स्मितेषु निःसन्दिग्धं बन्धकीं तां वदन्ति ॥
जिस ली के नेत्र केकर (कड़ा ऐंचाताना), पीले, श्याम या चञ्चल हों, वह बुरे स्वभाव वाली होती है तथा जिसके हँसने के समय गालों में गड्ढे पड़ जाते हों, वह व्यभिचारिणी होती है।
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