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बृहत्संहिता • अध्याय 70 • श्लोक 26
नवमं नयने च सनुणी सललाटं दशमं शिरस्तथा। अशुभेष्वशुभं दशाफलं चरणाचेषु शुभेषु शोभनम् ॥
इसी तरह परमायु ( १२०) का भी दश भाग करना चाहिये। यदि अंग का प्रथम भाग शुभ लक्षणों से युत हो तो आयु के प्रथम भाग में शुभ और अशुभ लक्षणों से युत हो तो आयु के प्रथम भाग में अशुभ फल कहना चाहिये। इसी तरह द्वितीय पुदि अंगभाग शुभाशुभ लक्षणों से युत हो तो आयु के द्वितीय आदि भाग में शुभाशुभ फल कहना चाहिये।
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