इसी तरह परमायु ( १२०) का भी दश भाग करना चाहिये। यदि अंग का प्रथम भाग शुभ लक्षणों से युत हो तो
आयु के प्रथम भाग में शुभ और अशुभ लक्षणों से युत हो तो आयु के प्रथम भाग में अशुभ फल कहना चाहिये। इसी तरह द्वितीय पुदि अंगभाग शुभाशुभ लक्षणों से युत हो तो आयु के द्वितीय आदि भाग में शुभाशुभ फल कहना चाहिये।
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