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अध्याय 14 — मानाध्याय:
सूर्य सिद्धांत
27 श्लोक • केवल अनुवाद
ब्राह्य, दिव्य, पित्र्य, प्राजापत्य, गौरव (गुरु सम्बन्धी बार्हस्पत्य), सौर, सावन, चान्द्र तथा नाक्षत्र ये नव प्रकार के काल मान बताये गये हैं।
यहाँ (भूलोक में) सौर, चान्द्र, नाक्षत्र और सावन इन ४ मानों का व्यवहार होता है। (६०) साठ संवत्सरों की बा्हस्पत्य मान से गणना होती हैं। शेष चार (ब्राह्म, पिव्रय, दिव्य, प्राजापत्य) मानों की नित्य आवश्यकता नहीं पड़ती।
दिन-रात्रि का मान, षडशीतिमुख संक्रान्तियों का मान, अयन (दक्षिणायन, उत्तरायण), विषुव (सौम्यगोल, याम्यगोल) तथा संक्रान्तियों का पुण्यकाल सौरमान से ज्ञात किया जाता है।
तुलादि से ८६ दिनों पर एक षडशीतिमुख होता है। ये क्रम से चार द्विस्वभाव राशियों (धनु-मीन-मिथुन-कन्या) में होती हैं।
तुलादि से ८६ दिनों पर अर्थात् धनु के २६ वें भाग पर तदनन्तर मीन के २२ अंश पर, तत्पश्चात् मिथुन के १८ अंश पर तथा कन्या के १४ वे अंश पर षडशीति मुख संक्रान्ति का काल होता है।
(षेडशीतिमुख संक्रान्तियों के अनन्तर) कन्या राशि के जो शेष १६ दिन रह जाते है। वे यज्ञों के तुल्य होते हैं तथा उनमें पितरों के लिए दिया हुआ दान अक्षय होता है।
राशि चक्र में समसूत्रगत दो विषुव संक्रन्तियाँ तथा एक ही व्यास रेखागत २ आयन संक्रान्तियाँ कुल चार संक्रान्तियाँ प्रसिद्ध हैं। इन संक्रान्तियों के मध्य में २-२ संक्रान्तियाँ होती है।
अव्यवहित क्रम से उक्त चार संक्रान्तियों के बाद वाली १-१ संक्रान्ति विष्णुपदी संज्ञक होती है। इस प्रकार विषुव संक्रान्तियों में दो तथा अयन संक्रान्तियों में दो विष्णुपदी संक्रान्तियाँ होती है।
सूर्य के मकर राशि में संक्रमण काल से छ: मास तक (मकर से मिथुनान्त तक) उत्तरायण एवं कर्क संक्रान्ति से छ: मास तक (कर्क से धनुरनत तक) दक्षिणायन होता है।
दो-दो राशियों के भोगकाल को ऋतु कहा जाता (अर्थात् दो राशियों तक सूर्य एक ऋतु में रहता) है। शिशिरादि ऋतुओं की प्रवृत्ति मकर राशि से होती है। अर्थात् मकर-कुम्भ में सूर्य के रहने पर शिशिर ऋतु, मीन-मेष में वसन्त आदि। मेषादि १२ बारह राशियों में सूर्य के रहने से १२ बारह मास होते है। तथा इन्हीं १२ मासों से १ सौर वर्ष होता है।
सूर्य विम्ब के कलामान (प्रमाण) को ६० से गुणकर सूर्य की गति से भाग देने पर जो लब्धि घट्यादि हो उसका आधा शत घटी संक्रान्ति काल से पूर्व तथा पश्चात् में संक्रान्ति का पुण्य काल होता है।
सूर्य और चन्द्रमा की युति के अनन्तर चन्द्रमा सूर्य से पृथक् होकर प्रतिदिन जितना पूर्व दिशा में जाता है वही चान्द्रमान है। सूर्य से चन्द्रमा के अन्तर १२ अंश होने पर १ तिथि होती है।
तिथि, करण, विवाह, क्षौर (मुण्डन) तथा जातकर्म प्रभूति अन्य सभी कार्य, ब्रत-उपवास तथा यात्रा की क्रियायें चान्द्रमान से व्यवहत होती हैं।
३० तिथियों का १ चान्द्रमास होता है। वही (१ मास) पितरों का एक अहोरात्र होता है। मासान्त में अर्थात् अमावास्या को मध्यरात्रि तथा पक्षान्त में (पूर्णिमा को) पितरों का दिनार्ध होता है। इन दोनों के मध्य भाग से अर्थात् पूर्णिमा के बाद (कृष्णपक्ष की) साढ़े सात तिथि से दिन का तथा कृष्ण पक्ष की अमावास्या के बाद (शुक्लपक्ष की) साढ़े सात तिथि से रात्रि का आरम्भ होता है।
भचक्र (नक्षत्र मण्डल) का दैनिक भ्रमण एक नाक्षत्र दिन होता है। (अर्थात् जितने काल में नक्षत्र मण्डल का एक चक्रभ्रमण पूर्ण होता है उतना काल नाक्षत्र दिन होता है)। पर्वान्त से (पूर्णिमा के दिन) जिस नक्षत्र का योग होता है उसी नक्षत्र के नाम से मासों के नाम होते हैं।
कृत्तिकादि दो दो नक्षत्रों के संयोग से कार्तिक आदि मास, अन्तिम, उपान्तिम और पाँचवाँ मास तीन-तीन नक्षत्रों के संयोग से होते हैं। जैसे - कृतिका या रोहिणी पूर्णिमा को हो तो कार्तिक, मृर्गशीर्ष या आर्द्रा से मार्गशीर्ष आदि मास होते हैं। अन्तिम (कार्तिकादि गणना से) आश्विन, उपान्तिम भाद्रपद तथा पजञ्चम फाल्गुन मास तीन तीन नक्षत्रों से होते हैं। जैसे - पू. फा., उ. फा., हस्त इन तीन नक्षत्रों से फाल्गुन मास होता है)।
वैशाख आदि मासों में कृष्णपक्ष की १५ वीं (अमावास्या) तिथि को कृत्तिका आदि नक्षत्रों के योग से बार्हस्पत्य कार्तिकादि मास होते हैं। इस (विधि) से जिस मास में गुरु अस्त या उदय होगा उस मास से सम्बन्धित बृहस्पति का वर्ष प्रारम्भ होता है।
सूर्य के एक उदय से दूसरे उदय पर्यन्त का समय सावनदिन संज्ञक होता है। अर्थात् एक ही क्षितिज पर दो सूर्योदयों के-मध्य का काछ एक सावन दिन होता है।
इन सावन दिवसों से ही यज्ञ आदि के कार्यों के लिए समय का निर्णय किया जाता है। सूतकादि का निर्धारण, दिन, मास और वर्ष स्वामियों का निर्णय तथा मध्यम ग्रहगति का निर्णय सावन मान से ही किया जाता है।
सूर्य के बारह राशियों के भोगकाल (भगण पूर्तिकाल) में देवताओं और दैत्यों का विपर्यय से जो अहोरात्र कहा गया है वही दिव्यमान होता है।
मन्वन्तर व्यवस्था (अर्थात् ७१ महायुगों का १ मनु) प्राजापत्य मान कहा गया है। वहाँ (मन्वन्तर मान में ) दिन-रात्रि का भेद नहीं होता। कल्प का मान ब्राह् मान कहा जाता है। क्योंकि १ कल्प के तुल्य ब्रह्मा का एक दिन और उतनी की ही एक रात्रि होती है।
इस समय जो परभाग (भूगोलाध्यायादि उत्तरार्ध) का वर्णन किया गया है वह परम अदुभुत, रहस्यमय तथा ब्रह्मस्वरूप है। अत: यह शास्त्र पुण्य प्रदान करने वाला तथा सभी पापों का नाश करने वाला होगा।
ईसमें दिव्य और नाक्षत्रमानों का विवेचन तथा ग्रहों के उत्तम ज्ञान को प्रदर्शित किया गया है। इसका ज्ञान प्राप्त कर मनुष्य सूर्यआदि लोकों में सदैव स्थान प्राप्त करता है।
इस प्रकार मय से भलीभाँति कहकर (सम्यग् ज्यौतिष शास्त्र का उप्देश कर) सूर्याशावतार पुरुष मय से पूजित होकर स्वर्ग में चंक्रमण करते हुये अपने मण्डल (सूर्य मण्डल) में प्रविष्ट हो गये।
अनन्तर (सूर्याशं पुरुष के सूर्य मण्डल में प्रविष्ट होने के अनन्तर) साक्षाद् भगवान सूर्य से ज्ञान प्राप्त कर मयासुर ने अपने आप को पाप रहित और कृतकृत्य माना।
मय ने सूर्य से ज्योतिष ज्ञान रूपी वरदान प्राप्त कर लिया है, ऋषि लोग यह जान कर मय के पास आये और आदर के साथ उक्त ज्ञान के विषय में पूछा।
मय दानव ने प्रसन्न होकर, लोक में अत्यन्त रहस्यमय ब्रह्म संज्ञक (ब्रह्मज्ञान) इस ज्ञान को जिज्ञासु ऋषियों को प्रदान किया।
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