यहाँ (भूलोक में) सौर, चान्द्र, नाक्षत्र और सावन इन ४ मानों का व्यवहार होता है। (६०) साठ संवत्सरों की बा्हस्पत्य मान से गणना होती हैं। शेष चार (ब्राह्म, पिव्रय, दिव्य, प्राजापत्य) मानों की नित्य आवश्यकता नहीं पड़ती।
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