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अध्याय 11 — पाताधिकार:
सूर्य सिद्धांत
23 श्लोक • केवल अनुवाद
यदि सूर्य और चन्द्र एक ही अयन में गये हो, दोनों का योग १२ राशि हो, तथा इनकी स्पष्ट क्रान्ति समान हो तो वैधृतसंज्ञक पात होता है।
जब सूर्य और चन्द्र का अयन परस्पर विपरीत हो, दोनों का योग ६ राशि हो तथा दोनों की क्रान्ति समान हो तब व्यतीपातसंज्ञक पात होता है।
क्रान्तिसाम्य कालिक सूर्य और चन्द्र के किरणों के संपर्क से तथा परस्पर दृष्टियों के क्रोध से उत्पन्न अग्नि, जो प्रवहवायु के वेग से आहत होकर प्रज्वचलित होती है, वह लोक के लिए अशुभ फलदायक होती है।
क्रान्तिसाम्यकालिक यह पातरूप अग्नि बार-बार लोक के मंगलो का नाश करती है इसलिये यह व्यतीपातसंज्ञक पात प्रसिद्ध है। यही व्यतीपातसंज्ञक अग्नि नाम भेद से वैधृतिपात संज्ञक होती है।
कृष्णवर्ण वाला, कठोर एवं भयंकर शरीरवाला, लाल नेत्रों से युक्त, विशाल उदरवाला, सबका अनिष्ट करने वाला भयानक वह (अग्निपुरुष रूपी पात) बारबार उत्पन्न होता है। (प्रायः: एक मास में दो बार पात की स्थिति आती है।)
दूकतुल्य अर्थात् अयनांशों से संस्कृत सूर्य और चन्द्र का योग १२ राशि या ६ राशि के तुल्य होने पर उनकी क्रान्ति का साधन करना चाहिये। अर्थात् सायन सूर्य द्वारा क्रान्ति तथा सायन चन्द्रमा द्वारा शर संस्कृत स्पष्ट क्रान्ति का साधन करना चाहिये।
विषमपद में स्थित चन्द्र की शरसंस्कृत क्रान्ति अर्थात् स्पष्टक्रान्ति यदि सूर्य की क्रान्ति से अधिक हो तो गत पात तथा ऊन हो तो गम्य पात होता है।
समपद में चन्द्रमा हो तो इससे विपरीत अर्थात् सूर्य की क्रान्ति से चन्द्र की क्रान्ति यदि न््यून हो तो गत पात, अधिक हो तो गम्यपात होता है। भिन्न दिशा के शर में चन्द्रक्रान्ति घट जाने पर चन्द्रमा का पद भिन्न होता है।
सूर्य और चन्द्रमा की क्रान्तिज्या को पृथक-पृथक त्रिज्या से गुणाकर दोनो में परमक्रान्तिज्या का भाग देने से जो लब्धि प्राप्त हो उनके चापों के अन्तर को अथवा अन्तर के आधे को गत-गम्य पातों के अनुसार चन्द्रमा में हीन युत करने से अभीष्ट चन्द्रमा होता है।
इस चन्द्र सम्बन्धिफल (चापान्तर वा चापान्तरार्ध) को सूर्य की गति से गुणाकर चन्द्र की गति का भाग देने से प्राप्त लब्धि को सूर्य में चन्द्रमा की तरह युत हीन करने से सूर्य होता है। ऐसे ही चन्द्र सम्बन्धी फल को चन्द्रषात की गति से गुणाकर चन्द्रगति का भाग देने से जो फल आवे उसका पात में विलोम संस्कार (अर्थात् चन्द्रमा में धन किया हो तो पात में ऋण और हीन किया हो तो युत ) करने से चन्द्रपात होता है।
इस प्रकार से साधन किये हुए सूर्य की क्रान्ति और पात संस्कृत चन्द्र की, स्पष्टक्रान्ति, अतुल्य हों तो फिर पूर्ववत् साधन किये हुए चापान्तर से संस्कृत सूर्य और चन्द्र की क्रान्ति का. साधन करना चाहिए। फिर भी यदि क्रान्ति अतुल्य हों तो जब. तक क्रान्ति समान न हो जाय तब तक असकृत (यही क्रिया बार-बार) करनी चाहिए। इस प्रकार सूर्य और चन्द्रमा की क्रान्ति समान होगी।
सूर्य और चन्द्र की स्पष्टक्रान्ति समान होने पर स्पष्टपात अर्थात् पात का मध्यकाल स्पष्ट होता है। स्पष्टपात सम्बन्धि चन्द्रमा अपने आसन्न अर्द्धरात्रकालिक चन्द्रमा से हीन हो तो उस अर्धरात्रिकाल से पातकाल गत तथा अधिक हो तो पातकाल गम्य होता है।
स्थिरीकृतचन्द्र अर्थात् स्पष्टक्रान्तिसाम्यकालिक चन्द्र और अर्धरात्रकालिकचन्द्र की अन्तरकला को ६० से गुणा कर गुणनफल में अर्धरात्रकालिक चन्द्रगति का भाग देने से प्राप्त लब्धितुल्य घटिका अर्धरात्रिकाल से पातकाल की गत गम्य घटिका होती हैं।
सूर्य और चन्द्र की (चन्द्रग्रहणाधिकारोक्त प्रकार से) बिम्बमान कला का साधन कर दोनों के योग के आधे (मान योग दल) को ६० से गुणाकर गुणनफल में सूर्य और चन्द्र की गत्यन्तर का भाग देने से लब्धि स्थित्यर्ध घटिका होती हैं।
पूर्वोक्त (स्थिरीकृतार्धरात्रेन्द्रो - इत्यादि) प्रकार से साधित स्पष्टपातकाल ही पात का मध्यकाल कहा गया है। इसमें स्थित्यर्ध घटिका घटाने से पात का आरम्भ काल तथा जोड़ने से पात का अन्तकाल अर्थात् निवृत्तिकाल होता है।
पात के आरम्भ और अन्त के मध्य का काल, अत्यन्त दारुण काल होता है। यह काल अत्यन्त कठिन और सम्पूर्ण (शुभ) कार्यों में निन्दित है। इसका स्वरूप देदीप्यमान अग्नि के तुल्य है। इसलिये इसमें किये हुए सम्पूर्ण कर्म जलकर भस्मीभूत हो जाते हैं। अत: इस काल में कोई शुभ कर्म नहीं करना चाहिए।
सूर्य और चन्द्र के बिम्बों के किसी एक प्रदेश की क्रान्ति जितने काल तक तुल्य रहती है उतने काल तक संपूर्ण शुभ कर्मों के नाश करने वाले पात की स्थिति रहती है।
उस (पात) काल में स्नान, दान, जप, श्राद्ध एवं अभीष्ट देवता की आराधना और होम आदि धर्म क्रिया करने से अत्यन्त पुण्य प्राप्त होता है। उस काल के जानने वाले (ज्योतिषी) को स्नान, दान आदि के तुल्य पुण्य स्वत: ही प्राप्त हो जाता है।
विषुवट्वृत्त की सन्निधि में अर्थात् गोलसन्धि के आसन्न में सूर्य और चन्द्र की क्रान्ति समान हो तो व्यतीपात-वैधृति भेदद्वयात्मक पात दो बार होगा। चन्द्र की अयन सन्धि के निकट यदि सूर्य की क्रान्ति से चन्द्र की क्रान्ति न्यून हो तो पात का अभाव होता है।
अयनांश संस्कृत सूर्य और चन्द्रमा के योग की कला में ८०० का भाग देने से लब्धि सप्तदशान्त (१६ से अधिक तथा १७ से अल्प) हो तो एक अन्य तीसरा व्यतिपात होता है। (क्रान्तिसाम्यरूप जो व्यतीपात और वैधृति ये दो पात कहे गये हैं उनसे भिन्न तीसरा व्यतीपात नामक योग है) यह भी सम्पूर्ण शुभ कर्मो में निषिद्ध है। २६ वें योग से आगे २७ वाँ वैधृति नामक योग भी सम्पूर्ण शुभ कर्मों में निषिद्ध है। यह भी पज्चाडुस्थ वैधृति योग एवं पूर्वोक्त वैधृत से भिन्न है।
आश्लेषा, ज्येष्ठा तथा रेवती नक्षत्र के चतुर्थ चरण को भसन्धि कहते हैं। इनसे अग्रिम नक्षत्रों मघा, मूल और अश्विनी नक्षत्रों के प्रथम चरण को गण्डान्त कहते हैं।
व्यतीपातत्रय, वैधृतित्रय, गण्डान्तत्रय और भसन्धित्रय ये सब घोर अर्थात् अशुभ हैं। अतः ये चारों घोर संज्ञक संपूर्ण शुभ कर्मों में वर्जित हैं।
हे मयासुर! यह सब कुछ परम पवित्र, ग्रह नक्षत्रादिकों का रहस्यमय महान चरित्र तुम्हारे लिए मैंने कहा, अब इससे अतिरिक्त और क्या सुनना चाहते हो?
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धर्म का अन्वेषण
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