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सूर्य सिद्धांत • अध्याय 11 • श्लोक 4
व्यतिपातवैधृतयोरन्वर्थता विनाशयति पातो5स्मिन्‌ लोकानामसकृद्यत: । व्यतीपात: प्रसिद्धोड्यं सक्ञाभेदेन वैधृत: ॥
क्रान्तिसाम्यकालिक यह पातरूप अग्नि बार-बार लोक के मंगलो का नाश करती है इसलिये यह व्यतीपातसंज्ञक पात प्रसिद्ध है। यही व्यतीपातसंज्ञक अग्नि नाम भेद से वैधृतिपात संज्ञक होती है।
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