अयनांश संस्कृत सूर्य और चन्द्रमा के योग की कला में ८०० का भाग देने से लब्धि सप्तदशान्त (१६ से अधिक तथा १७ से अल्प) हो तो एक अन्य तीसरा व्यतिपात होता है। (क्रान्तिसाम्यरूप जो व्यतीपात और वैधृति ये दो पात कहे गये हैं उनसे भिन्न तीसरा व्यतीपात नामक योग है) यह भी सम्पूर्ण शुभ कर्मो में निषिद्ध है। २६ वें योग से आगे २७ वाँ वैधृति नामक योग भी सम्पूर्ण शुभ कर्मों में निषिद्ध है। यह भी पज्चाडुस्थ वैधृति योग एवं पूर्वोक्त वैधृत से भिन्न है।
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