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सूर्य सिद्धांत • अध्याय 11 • श्लोक 9
पातस्व गतगम्वकालकज्ञानम्‌ क्रान्त्योर्ज्ये त्रिज्यया5भ्यस्ते परक्रान्तिज्ययोद्धृते । तच्चापान्तरमर्ध वा योज्यं भाविनि शीतगौं ॥
सूर्य और चन्द्रमा की क्रान्तिज्या को पृथक-पृथक त्रिज्या से गुणाकर दोनो में परमक्रान्तिज्या का भाग देने से जो लब्धि प्राप्त हो उनके चापों के अन्तर को अथवा अन्तर के आधे को गत-गम्य पातों के अनुसार चन्द्रमा में हीन युत करने से अभीष्ट चन्द्रमा होता है।
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