एकायनगत॑ यावदक्केन्द्रोमण्डलान्तरम् ।
सम्भवस्तावदेवास्य सर्व कर्मविनाशकृत् ॥
सूर्य और चन्द्र के बिम्बों के किसी एक प्रदेश की क्रान्ति जितने काल तक तुल्य रहती है उतने काल तक संपूर्ण शुभ कर्मों के नाश करने वाले पात की स्थिति रहती है।
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