मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
सूर्य सिद्धांत • अध्याय 11 • श्लोक 17
एकायनगत॑ यावदक्केन्द्रोमण्डलान्तरम्‌ । सम्भवस्तावदेवास्य सर्व कर्मविनाशकृत्‌ ॥
सूर्य और चन्द्र के बिम्बों के किसी एक प्रदेश की क्रान्ति जितने काल तक तुल्य रहती है उतने काल तक संपूर्ण शुभ कर्मों के नाश करने वाले पात की स्थिति रहती है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
सूर्य सिद्धांत के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

सूर्य सिद्धांत के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें