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सूर्य सिद्धांत • अध्याय 11 • श्लोक 3
पातस्याशु भत्वम्‌ तुल्यांशुजालसम्पर्कात्‌ तयोस्तु प्रवहाहत: । तददृकक्रोधभवों वहिनिर्लोकाभावाय जायते ॥
क्रान्तिसाम्य कालिक सूर्य और चन्द्र के किरणों के संपर्क से तथा परस्पर दृष्टियों के क्रोध से उत्पन्न अग्नि, जो प्रवहवायु के वेग से आहत होकर प्रज्वचलित होती है, वह लोक के लिए अशुभ फलदायक होती है।
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