पात के आरम्भ और अन्त के मध्य का काल, अत्यन्त दारुण काल होता है। यह काल अत्यन्त कठिन और सम्पूर्ण (शुभ) कार्यों में निन्दित है। इसका स्वरूप देदीप्यमान अग्नि के तुल्य है। इसलिये इसमें किये हुए सम्पूर्ण कर्म जलकर भस्मीभूत हो जाते हैं। अत: इस काल में कोई शुभ कर्म नहीं करना चाहिए।
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