उस (पात) काल में स्नान, दान, जप, श्राद्ध एवं अभीष्ट देवता की आराधना और होम आदि धर्म क्रिया करने से अत्यन्त पुण्य प्राप्त होता है। उस काल के जानने वाले (ज्योतिषी) को स्नान, दान आदि के तुल्य पुण्य स्वत: ही प्राप्त हो जाता है।
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