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अध्याय 30 — त्रिंशत्तम अध्याय

शिवभारतम्
31 श्लोक • केवल अनुवाद
कवीन्द्र बोले - तत्पश्चात तोपों द्वारा लक्ष्य संघान में विशेष पराक्रमी, प्राकार युद्ध में निपुण, संपत्ति से कुबेर को जीतने वाला में मयनामक असुर की तरह शिल्प कला में निपुण समुद्र संचरण में दुर्जेय, दुर्गम मार्गों का राही यवनों से नीच फिरंगी (पुर्तगीज़ और डच इत्यादि) अनाच्छादन नावों को चलाने में निपुण मलवारों को, अन्य द्वीपों के निवासियों को, अनेक समुद्री व्यापारियों को मदमस्त महान हाथी के समान शत्रु मांडलिक को उस बलवान शिवाजी ने बलपूर्वक लाकर उसको विभिन्न करों को देने के लिए बाध्य किया।
उन-उन लोभी अविन्धों द्वारा दीर्घकाल तक संग्रहित की हुई राजपुर के संपत्ति को तत्काल उसने अधीन कर लिया।
सोने के निक्षेप द्वारा परिपूर्ण कढ़ाईयाँ भूमि में दबाकर रखी हुई थी ऐसी भूमि को उस दुष्टों का विनाश करने वाले (शिवाजी) ने अनेक खोदने वालों के द्वारा खुदवाई।
वहां उस राजा की आंखों में सिद्धांजन डाला हुआ नहीं था, फिर भी उसे दबाए गए खजाने दिख गए।
उस राजा ने जहां जहां अपनी दृष्टि घुमाई वहां वहां मेरु पर्वत की तरह स्वर्ण राशि उत्पन्न हो गई।
वहां महापुरुषों द्वारा अर्पित की गई रत्न राशि से वह भी दूर रत्नों का पर्वत मानो समीप स्थित हो गया हो।
दीर्घ काल तक यवनों द्वारा निवास करने से अशुद्ध हुई एवं दबाई गई निक्षेप से युक्त भूमि को उसने खनकों द्वारा शुद्ध कर दिया हो।
सोना, रुपए, पीतल, सीसा, तांबा, लोहा, कीथल, कांच, स्वर्णमाक्षिक, मोती, मरकतमणि, हीरा, गैंडे के सींग, चामर, हाथी के दांत, कस्तूरी, केसर, चंदन, कपूर, कृष्णागरु, पलाश, ककोल, लालचंदन, इलायची, लवंग, दालचीनी, चीनदारू, निर्माल्ली, मगरमच्छ के नाखून, वेणारमूल, नागकेशर, जायफल, भांग, महिफेन, तमाल पत्र, प्रियाल का वृक्ष, अखरोट, द्राक्षा, खजूर, खर्बुर, मिरी, सुफारी, देवदारू, सौंठ, ग्रंथि, पिप्पलामूल, जटामांसी, चवक, हल्दी, सेंधा नमक, सौर्वचल, शाल वृक्ष, हरितकी, तपन, शिलाजीत, मेण, मूली, नीला सुरमा, काला सुरमा, अजवाइन, मंजीटी, सिंदूर, पारा, हड़ताल, गंधक, मंछल, लाख, फुलसत्व, गोरोचन, अभ्रक, अनेक प्रकार के विष एवं विष उतारने के द्रव्य, रेशमी वस्त्र, शृण से उत्पन्न अट्टालिका फलज ऊन की चादरें ऐसे नवीन वस्त्र और अनेक अन्य पदार्थ उस राजा ने उस समय बड़े भार का वहन करने वाले घोड़े, घोड़ियों, बैलों, भार ढोने का वालों आदि के द्वारा वहन करवाकर अपने विभिन्न किलो में रखवा दिया।
शैज्वली, सौंदेल (समदल), हरचेरी, नेवरे, नागवडे, कोतवड़े केलवली कशेली उन्नत धामनस बेलवड़े क्षारपतन और अन्य गांव ने भी उसको कर ला कर दिया।
इस प्रकार विभिन्न प्रांतों को अधीन करके विविध करो को लेकर वह प्रतापी राजा अपने राष्ट्र की ओर चल दिया।
पंडित बोले - मुगलों की सेना को भगाकर शिवाजी ने दाभोल शीघ्र ले लिया उसी प्रकार चिपकूण अपने अधीन कर लिया और संगमेश्वर को तो अनायास ही ले लिया। अहो! संपूर्ण राजपुर को भी पाताल पर्यंत खोद डाला सभी खजाने ले लिए और नागरिकों को कैद किया उसी प्रकार अपने सामर्थ्य से समुद्र को अपने अधीन कर लिया इस प्रकार शिवाजी ने द्वेष से संपूर्ण देश व्याप्त कर लिया यह जानकर उस समय आदिलशाह ने कौन सा उपाय किया?
कविंद्र बोला - वह हमारा शत्रु जब राजपुर की और जा रहा था तो उसको अत्यंत दुर्गम अरण्य के मार्ग में तूने क्यों नहीं रोका?
ठीक है या इस समय रहने दो। अब वह हमारा उन्मत्त शत्रु लौटकर हमारे समीप आया है अतः उसे जानकर रोक दो।
इस प्रकार दूखी आदिल शाह ने श्रृंगार पुर के राजा सूर्या जी राव को संदेश भिजवाया।
पंडित बोले - उस समय उस आदिलशाह ने सभी सेनापतियों को छोड़ कर उस राजा को उस कार्य पर क्यों नहीं लगाया?
कविंद्र बोला - शिवाजी ने पहले पराजित किए गए रुस्तम आदि सेनापति उनसे युद्ध करने में समर्थ नहीं होंगे, इस प्रकार से मन में विचार करके वन के मध्य भाग में रहने वाले एवं पदातियों से युक्त उस राजा को दुष्कर कार्य होते हुए भी नियुक्त कर दिया।
तब उस अत्यंत अभिमानी एवं पराक्रमी राजा ने आदिलशाह की आज्ञा से जैसे हाथी अभिमान से सिंह से द्वेष करता है वैसे ही अभिमान से शिवाजी से शत्रुता की।
शिवाजी ने दुर्गम मार्ग को साफ करने की इच्छा से संगमेश्वर में स्थापित सेना के साथ अपनी सेना को लेकर शीघ्र घेरा डाल दिया।
विशाल बताई गई सेना की सहायता से शिवाजी की विशाल सेना को मध्यरात्रि में घेरकर दुर्भाग्य युद्ध करने का इच्छुक वह सूर्याजी राव बहुत देर तक मेघ की तरह गर्जना करने लगा।
गरुड़ जैसे नाग के फुंकार को सहन नहीं करता है उसी प्रकार कानों में पड़ी हुई उसकी प्रचंड गर्जना को उस समय तानाजी प्रवृत्ति योद्धाओं ने सहन नहीं किया।
तब अत्यंत भयभीत नीलकंठ राजा का पुत्र दुर्भाग्य चार्ली पीला जी ने मानो प्रभावली के राजा को यश प्राप्ति कराने के लिए युद्ध की अपेक्षा पलायन को ही उत्तम समझा।
कंपन से युक्त अत्यधिक श्वास प्रश्वास लेने वाले हाथ की तलवार को नीचे फेंक कर पलायन करने वाले और पिलाजी को शीघ्र कुछ ही पलों में माल सुरेश ने स्वयं हाथ से पकड़ लिया एवं उसका धिक्कार किया।
मालसुरे बोला - इस युद्ध में मैं तेरा सहायक हूं तू अपने लोगों को छोड़कर पलायन कर रहा है यह दुख की बात है पहले जो तू प्रशंसा करता था वह तेरी प्रशंसा कहां चली गई?
जिस इष्ट दाता शिवाजी ने तेरा बड़प्पन के साथ पालन पोषण किया और तू सेनापति उन्हें ऐसे छोड़ कर भाग रहा है और अरे तुझे लज्जा भी नहीं आती है।
इस प्रकार बोलकर उस भयभीत पिलाजी को अपने समीप रस्सी से पत्थर पर सुदृढ़ बांधकर वहां अपने पराक्रम को पग पग पर प्रदर्शित करता हुआ नाचने लगा।
मृत्यु को प्राप्त हुए शत्रु पक्ष के वीरों के रक्त से परिपूर्ण एवं अनेक युद्ध रूपी सुंदरियों के कान का आभूषण वह तानाजी मालुसरे युद्ध में शोभायमान हो रहा था एवं उसके तेज से उस रात्रि में सूर्य उत्पन्न हो गया था।
तब स्वयं की हुई जयघोषों की ध्वनियों ने मेघ की गरजना को ग्रसित कर लिया जिनके हाथों में तलवारे चमक रही है एवं जो पग पग पर मारने के लिए उद्यत हैं ऐसे शत्रु के विशाल भीड़ में विचलित ना होने वाले एवं उत्तम धनुर्धारी सैनिकों ने उसकी रक्षा की।
तैयार हो जा, प्रहार कर दे, रुक जा, पहुंचों, बचाओं, छोड़ दे, भाग जा, ले जा, वापस दे, देख, फोड़ दे, तोड़ दे, ले, गिरा दे, छोड़ दे इस प्रकार की वहां उच्च ध्वनि में गर्जना करने वाले एवं एक दूसरे योद्धाओं पर दौड़कर आक्रमण करने वाले दोनों पक्षों के योद्धाओं का कोलाहल हुआ।
चमकदार रत्नों से जड़ित अंगूठी के चमक से जिसके नाखूनों की कांति चित्र विचित्र हो गई है ऐसे पगड़ी रहित मस्तक के पास में पड़े हुए हाथ पैर और आकाशीय विद्युत के समान चमकने वोली तलवारों से टूटे हुए एवं जिनके ऊपर अनेक रक्त प्रवाह का संचय है ऐसे दूसरे अवयव थे जिसके कारण से वह भूमि दुर्गम हो गई थी।
शिवरात्रि के समाप्ति पर सूर्य की किरणें जैसे अंधकार को मिटा देती है उसी प्रकार शिवाजी के योद्धाओं द्वारा पूर्ण पराजित हुई व शत्रु की सेना तत्काल समाप्त हो गई अर्थात पलायन कर गई।
फिर उस शत्रु पक्ष के श्रेष्ठ सैनिकों के पलायन करने पर प्रवीण बादल की तरह गर्जना करने वाली दुंदुभी के साथ मालसुरे गर्जना करने लगा।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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