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शिवभारतम् • अध्याय 30 • श्लोक 29
स्फूर्जद्रत्नांगुलीयद्युतिशबलनखद्योतिभिः पंचशाखैः सस्तोष्णीषैः शिरोभिर्निगिडनिपतितैरंन्ध्रिभिर्वाहुभिश्च। अंगैरन्यैश्च हंत क्षणरुचिविलसत्खड्गवल्लीनिकृत्तेः उत्कृष्टासृक्प्रवाहप्रचयिभिरथ सा दुर्गमाभूद्धरित्री।।
चमकदार रत्नों से जड़ित अंगूठी के चमक से जिसके नाखूनों की कांति चित्र विचित्र हो गई है ऐसे पगड़ी रहित मस्तक के पास में पड़े हुए हाथ पैर और आकाशीय विद्युत के समान चमकने वोली तलवारों से टूटे हुए एवं जिनके ऊपर अनेक रक्त प्रवाह का संचय है ऐसे दूसरे अवयव थे जिसके कारण से वह भूमि दुर्गम हो गई थी।
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