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शिवभारतम् • अध्याय 30 • श्लोक 28
आतिष्ठ प्रहर प्रयच्छ विरम व्यापारय प्रापय त्रायस्व त्यज मुंच विद्रव नय व्यावर्तयालोकय। भिद्धि च्छिन्द्धि गृहाण पातय जहीत्युच्चैस्ततो गर्जतां योधानामभिधावतामुभयतः कोलाहलः कोऽप्यमूत् ।।
तैयार हो जा, प्रहार कर दे, रुक जा, पहुंचों, बचाओं, छोड़ दे, भाग जा, ले जा, वापस दे, देख, फोड़ दे, तोड़ दे, ले, गिरा दे, छोड़ दे इस प्रकार की वहां उच्च ध्वनि में गर्जना करने वाले एवं एक दूसरे योद्धाओं पर दौड़कर आक्रमण करने वाले दोनों पक्षों के योद्धाओं का कोलाहल हुआ।
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