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शिवभारतम् • अध्याय 30 • श्लोक 1
कवीन्द्र उवाच - अथाग्नियन्त्रसंधानविशेषोदग्नविक्रमान्। प्राकारयुद्धकुशलान् ऋध्या जितधनेश्वरान् ।। मयमायाधरान् अब्धिमध्यसंचारदुर्धरान्। उन्मार्गवर्तिनस्तांस्तान् फैरंगान् यवनावरान् ।। तथा नीसाधनपरान् मल्लवारान् अनावरान्। सांयात्रिकाननेकांश्च कृतद्वीपांतराश्रयान्।। असंमतांश्च सामन्तान् मत्तानिव महाद्विपान्। बलैरानाय्य स बली तत्तदानाययद्धनम्।।
कवीन्द्र बोले - तत्पश्चात तोपों द्वारा लक्ष्य संघान में विशेष पराक्रमी, प्राकार युद्ध में निपुण, संपत्ति से कुबेर को जीतने वाला में मयनामक असुर की तरह शिल्प कला में निपुण समुद्र संचरण में दुर्जेय, दुर्गम मार्गों का राही यवनों से नीच फिरंगी (पुर्तगीज़ और डच इत्यादि) अनाच्छादन नावों को चलाने में निपुण मलवारों को, अन्य द्वीपों के निवासियों को, अनेक समुद्री व्यापारियों को मदमस्त महान हाथी के समान शत्रु मांडलिक को उस बलवान शिवाजी ने बलपूर्वक लाकर उसको विभिन्न करों को देने के लिए बाध्य किया।
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