जातरूपं तथा रुप्यमारकूटं च सीसकम्। ताम्र लोहं च वंग च काचं च स्वर्णमाक्षिकम् ।। मुक्तां मरकतं पद्मरागं वज्र च विद्रुमम्। खंगशृंगं चामरं च रदं स्तांबेरमं तथा। कस्तूरिकां च काश्मीरं पाटीरं हिमवालुकाम्। कालागुरू च कर्पूर कंकोलं रक्तचन्दनम् ।। एलां च देवकुसुमं त्वक्पत्रं चीनदारु च। कतर्क नक्रनखरं नलदं नागकेसरम् ।। जातीफलं मातुलानीमहिफेनं च पत्रकम्। राजादनं कंदरालं द्राक्षां खर्जूरकं तथा।। खर्बरं मरिचं पूगं देवदारु च नागरम्। ग्रन्थिकं च पलां चव्यं कांचनीमथ सैंधवम् ।। सौवर्चलं यवक्षारं सर्जिकां च हरीतकीम्। वृकधूपं सर्जरसं सिलाजतु च सिक्थकम् ।। तार्थ्यशैलं शिखिग्रीवं चक्षुष्यां यामुनं पुनः। अजमोदां च बाह्रीकं जीरके लोध्रकं तथा। गुग्गुलं पावकशिखं मंजिष्ठां नागसंभवम्। पारदं हरितालं च गंधाश्मानं मनःशिलाम् ।। लाक्षां गंधरसं चापि गोरोचनमथाभ्रकम्। तांस्तान् विषविशेषांश्च तत्तन्निर्हरणानि च ।। कौशेयान्यथ तार्णानि श्रौमाणि फलजानि च। रांकवाणि तथौर्णानि वासांस्यभिनवानि च ।। एतान्यन्यानि च तदा वस्तूनि बहुशो नृपः। महाभारसहैर्वाहैर्वामीभिर्वृषभैस्तथा।। भारयष्टिधरैश्चापि पुरुषैर्विष्टिकारिभिः। वाहयित्वात्मदुर्गेषु तेषु तेषु न्यधापयत्।।
सोना, रुपए, पीतल, सीसा, तांबा, लोहा, कीथल, कांच, स्वर्णमाक्षिक, मोती, मरकतमणि, हीरा, गैंडे के सींग, चामर, हाथी के दांत, कस्तूरी, केसर, चंदन, कपूर, कृष्णागरु, पलाश, ककोल, लालचंदन, इलायची, लवंग, दालचीनी, चीनदारू, निर्माल्ली, मगरमच्छ के नाखून, वेणारमूल, नागकेशर, जायफल, भांग, महिफेन, तमाल पत्र, प्रियाल का वृक्ष, अखरोट, द्राक्षा, खजूर, खर्बुर, मिरी, सुफारी, देवदारू, सौंठ, ग्रंथि, पिप्पलामूल, जटामांसी, चवक, हल्दी, सेंधा नमक, सौर्वचल, शाल वृक्ष, हरितकी, तपन, शिलाजीत, मेण, मूली, नीला सुरमा, काला सुरमा, अजवाइन, मंजीटी, सिंदूर, पारा, हड़ताल, गंधक, मंछल, लाख, फुलसत्व, गोरोचन, अभ्रक, अनेक प्रकार के विष एवं विष उतारने के द्रव्य, रेशमी वस्त्र, शृण से उत्पन्न अट्टालिका फलज ऊन की चादरें ऐसे नवीन वस्त्र और अनेक अन्य पदार्थ उस राजा ने उस समय बड़े भार का वहन करने वाले घोड़े, घोड़ियों, बैलों, भार ढोने का वालों आदि के द्वारा वहन करवाकर अपने विभिन्न किलो में रखवा दिया।
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