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अध्याय 1 — हारीतगीता

हारीतगीता
23 श्लोक • केवल अनुवाद
युधिष्ठिर ने पूछा - पितामह! प्रकृति से परे जो परब्रह्म का अविनाशी परमधाम है, उसे कैसे स्वभाव, किस तरह के आचरण, कैसी विद्या और किन कर्मों में तत्पर रहने वाला पुरुष प्राप्त कर सकता है?
भीष्मजी ने कहा - राजन्! जो पुरुष मोक्षधर्मों में तत्पर, मिताहारी और जितेन्द्रिय होता है, वह उस प्रकृति से परे परब्रह्म परमात्मा का जो अविनाशी परमधाम है, उसे प्राप्त कर लेता है।
युधिष्ठिर! पूर्वकाल में हारीतमुनि ने जो ज्ञान का उपदेश किया है, इस विषय में विज्ञ पुरुष उसी प्राचीन इतिहास का उदाहरण दिया करते हैं, उसे सुनो!
मुमुक्षु पुरुष को चाहिये कि लाभ और हानि में समान भाव रखकर मुनि-वृत्ति से रहे और भोगों के उपस्थित होने पर भी उनकी आकांक्षा से रहित हो अपने घर से निकलकर संन्यास ग्रहण कर ले।
न नेत्र से, न मन से और न वाणी से ही वह दूसरे के दोष देखे, सोचे या कहे। किसी के सामने या परोक्ष में पराये दोष की चर्चा कहीं न करे।
समस्त प्राणियों में से किसी की भी हिंसा न करे, किसी को भी पीड़ा न दे। सबके प्रति मित्रभाव रखकर विचरता रहे। इस नश्वर जीवन को लेकर किसी के साथ शत्रुता न करे।
यदि कोई अपने प्रति अमर्यादित बात कहे, निन्दा या कटुवचन सुनाये तो उसके उन वचनों को चुपचाप सह ले। किसी के प्रति अहंकार या घमंड न प्रकट करे। कोई क्रोध करे तो भी उससे प्रिय वचन ही बोले। यदि कोई गाली दे तो भी उसके प्रति हितकर वचन ही मुँह से निकाले।
गाँव या जनसमुदाय में दायें-बायें न करे, किसी का पक्ष-विपक्ष नः करे तथा भिक्षावृत्ति को छोड़कर किसी के यहाँ पहले से निमन्त्रित होकर भोजन के लिये न जाय।
कोई अपने ऊपर धूल या कीचड़ फेंके तो मुमुक्षु पुरुष उससे आत्मरक्षामात्र करे। बदले में स्वयं भी वैसा ही न करे और न मुँह से कोई अप्रिय वचन ही निकाले। सर्वदा मृदुता का बर्ताव करे। किसी के प्रति कठोरता न करे। निश्चिन्त रहे और बहुत बढ़-बढ़कर बातें न बनाये।
जब रसोईघर से धूआँ निकलना बन्द हो जाय, अनाज-मसाला कूटने के लिये, उठाया हुआ मूसल अलग रख दिया जाय, चूल्हे की आग ठंडी पड़ जाय, घर के लोग भोजन कर चुके हों और बर्तनों का संचार-रसोई परोसी हुई थाली का इधर-उधर ले जाया जाना बन्द हो जाय, उस समय संन्यासी मुनि को भिक्षा प्राप्त करने की चेष्टा करनी चाहिये।
उसे केवल अपनी प्राण-यात्रा के निर्वाह-मात्र का यत्न करना चाहिये। भर पेट भोजन मिल जाय, इसकी इच्छा नहीं रखनी चाहिये। यदि भिक्षा न मिले तो उससे मन में पीड़ा का अनुभव न करे और मिल जाय तो उसके कारण वह हर्षित न हो।
साधारण (लौकिक) लाभ की इच्छा न करे। जहाँ विशेष आदर एवं पूजा होती हो, वहाँ भोजन न करे। मुमुक्षु पुरुष को आदर-सत्कार के लाभ की तो निन्दा करनी चाहिये।
भिक्षा में मिले हुए अन्न के दोष बताकर उनकी निन्दा न करे और न उसके गुण बताकर उन गुणों की प्रशंसा ही करे। सोने और बैठने के लिये सदा एकान्त का ही आदर करे।
सूने घर, वृक्ष की जड़, जंगल अथवा पर्वत की गुफा में अथवा अन्य किसी गुप्त स्थान में अज्ञात-भाव से रहकर आत्मचिन्तन में ही लगा रहे।
लोगों के अनुरोध या विरोध करने पर भी सदा समभाव से रहे, निश्चल एवं स्थिरचित्त हो जाय तथा अपने कर्मों द्वारा पुण्य एवं पाप का अनुसरण न करे।
सर्वदा तृप्त और सन्तुष्ट रहे। मुख और इन्द्रियों को प्रसन्न रखे। भय को पास न आने दे। प्रणव आदि का जप करता रहे तथा वैराग्य का आश्रय ले मौन रहे।
भौतिक देह, इन्द्रिय आदि सभी वस्तुएँ नष्ट होने वाली हैं और प्राणियों के आवागमन, जन्म और मरण बारम्बार होते रहते हैं। यह सब देख और सोचकर जो सर्वत्र निःस्पृह तथा समदर्शी हो गया है, पके (रोटी, भात आदि) और कच्चे (फल, मूल आदि) से जीवन-निर्वाह करता है, आत्मलाभ के लिये जो शान्तचित्त हो गया है तथा जो मिताहारी और जितेन्द्रिय है, वही वास्तव में संन्यासी कहलाने योग्य है।
संन्यासी, तपस्वी होकर वाणी, मन, क्रोध, हिंसा, उदर और उपस्थ - इनके वेगों को सहता हुआ इन्हें वश में रखे। दूसरों द्वारा की हुई निन्दा उसके हृदय में कोई विकार न उत्पन्न करे।
प्रशंसा और निन्दा - दोनों में समान भाव रखकर उदासीन ही रहना चाहिये। संन्यासाश्रम में इस प्रकार का आचरण परम पवित्र माना गया है।
संन्यासी को महामनस्वी, सब प्रकार से जितेन्द्रिय, सब ओर से असंग, सौम्य, मठ और कुटिया से रहित तथा एकाग्रचित्त होना चाहिये। उसे अपने पूर्व आश्रम के परिचित स्थानों में नहीं विचरना चाहिये ।
वानप्रस्थों और गृहस्थों के साथ उसे कभी संसर्ग नहीं रखना चाहिये। अपनी रुचि प्रकट किये बिना ही जो वस्तु प्राप्त हो जाय, उसी को लेने की इच्छा रखनी चाहिये तथा अभीष्ट वस्तु के मिलने पर उसके मन में हर्ष का आवेश नहीं होना चाहिये।
यह संन्यासाश्रम ज्ञानियों के लिये तो मोक्षरूप है, परंतु अज्ञानियों के लिये श्रमरूप ही है। हारीतमुनि ने विद्वानों के लिये इस सम्पूर्ण धर्म को मोक्ष का विमान बताया है।
जो पुरुष सबको अभय-दान देकर घर से निकल जाता है, उसे तेजोमय लोकों की प्राप्ति होती है तथा वह अनन्त परमात्मपद को प्राप्त करने में समर्थ होता है।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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