मुमुक्षु पुरुष को चाहिये कि लाभ और हानि में समान भाव रखकर मुनि-वृत्ति से रहे और भोगों के उपस्थित होने पर भी उनकी आकांक्षा से रहित हो अपने घर से निकलकर संन्यास ग्रहण कर ले।
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