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हारीतगीता • अध्याय 1 • श्लोक 4
स्वगृहादभिनिस्सृत्य लाभेऽलाभे समो मुनिः । समुपोढेषु कामेषु निरपेक्षः परिव्रजेत् ॥
मुनि को अपने गृह का त्याग करके निकल जाना चाहिए। वह लाभ और हानि में समान भाव रखे तथा सामने उपस्थित होने वाले भोगों और कामनाओं के प्रति निरपेक्ष रहकर परिव्राजक के रूप में विचरण करे।
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