मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
हारीतगीता • अध्याय 1 • श्लोक 21
वानप्रस्थगृहस्थाभ्यां न संसृज्येत कर्हिचित्। अज्ञातलिप्सं लिप्सेत न चैनं हर्ष आविशेत् ॥
वानप्रस्थों और गृहस्थों के साथ उसे कभी संसर्ग नहीं रखना चाहिये। अपनी रुचि प्रकट किये बिना ही जो वस्तु प्राप्त हो जाय, उसी को लेने की इच्छा रखनी चाहिये तथा अभीष्ट वस्तु के मिलने पर उसके मन में हर्ष का आवेश नहीं होना चाहिये।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
हारीतगीता के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

हारीतगीता के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें