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हारीतगीता • अध्याय 1 • श्लोक 14
शून्यागारं वृक्षमूलमरण्यमथवा गुहाम्। अज्ञातचर्यां गत्वान्यां ततोऽन्यत्रैव संविशेत् ॥
सूने घर, वृक्ष की जड़, जंगल अथवा पर्वत की गुफा में अथवा अन्य किसी गुप्त स्थान में अज्ञात-भाव से रहकर आत्मचिन्तन में ही लगा रहे।
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