तपस्वी को वाणी के वेग, मन के वेग, क्रोध के वेग, हिंसा की प्रवृत्ति, उदर(भोजन) और उपस्थ(कामवासना)के वेग को सहन एवं नियंत्रित करना चाहिए। साथ ही, किसी की निन्दा उसके हृदय को विचलित न करे।
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