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हारीतगीता • अध्याय 1 • श्लोक 18
वाचो वेगं मनसः क्रोधवेगं हिंसावेगमुदरोपस्थवेगम् । एतान् वेगान् विषहेद् वै तपस्वी निन्दा चास्य हृदयं नोपहन्यात् ॥
तपस्वी को वाणी के वेग, मन के वेग, क्रोध के वेग, हिंसा की प्रवृत्ति, उदर (भोजन) और उपस्थ (कामवासना) के वेग को सहन एवं नियंत्रित करना चाहिए। साथ ही, किसी की निन्दा उसके हृदय को विचलित न करे।
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