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हारीतगीता • अध्याय 1 • श्लोक 17
अभ्यस्तं भौतिकं पश्यन् भूतानामागतिं गतिम्‌। निःस्पृहः समदर्शी च पक्वापक्वेन वर्तयन्‌। आत्मना यः प्रशान्तात्मा लघ्वाहारो जितेन्द्रियः ॥
जो भौतिक जगत् के स्वभाव को समझते हुए समस्त प्राणियों की उत्पत्ति और विनाश को देखता है, निःस्पृह और समदर्शी रहता है, परिपक्व और अपरिपक्व सभी के साथ समान भाव से व्यवहार करता है, अपने द्वारा अपने अन्तःकरण को शान्त रखता है, अल्पाहारी है और इन्द्रियों को वश में रखता है।
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