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हारीतगीता • अध्याय 1 • श्लोक 17
अभ्यस्तं भौतिकं पश्यन् भूतानामागतिं गतिम्‌। निःस्पृहः समदर्शी च पक्वापक्वेन वर्तयन्‌। आत्मना यः प्रशान्तात्मा लघ्वाहारो जितेन्द्रियः ॥
भौतिक देह, इन्द्रिय आदि सभी वस्तुएँ नष्ट होने वाली हैं और प्राणियों के आवागमन, जन्म और मरण बारम्बार होते रहते हैं। यह सब देख और सोचकर जो सर्वत्र निःस्पृह तथा समदर्शी हो गया है, पके (रोटी, भात आदि) और कच्चे (फल, मूल आदि) से जीवन-निर्वाह करता है, आत्मलाभ के लिये जो शान्तचित्त हो गया है तथा जो मिताहारी और जितेन्द्रिय है, वही वास्तव में संन्यासी कहलाने योग्य है।
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